इराक, अफगानिस्तान, सीरिया… तख्तापलट की लंबी है फेहरिस्त, क्या ईरान में कामयाब होगा अमेरिका

इराक, अफगानिस्तान, सीरिया... तख्तापलट की लंबी है फेहरिस्त, क्या ईरान में कामयाब होगा अमेरिका इराक, अफगानिस्तान, सीरिया... तख्तापलट की लंबी है फेहरिस्त, क्या ईरान में कामयाब होगा अमेरिका

ईरान पर फिलहाल अमेरिका और इजरायल के हमले जारी हैं. वजह कभी परमाणु हथियार कार्यक्रम तो कभी मिसाइल कार्यक्रम और अब सत्ता परिवर्तन. तो क्या अमेरिका पहली बार ऐसा कर रहा है. जवाब है नहीं. अमेरिका का दूसरे देशों में हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन का इतिहास काफी पुराना है. 19वीं सदी के अंत से लेकर अब तक अमेरिका ने प्रत्यक्ष सैन्य हमले, खुफिया एजेंसियों के जरिया सत्ता तख्तापलट और आर्थिक दबाव के जरिए दर्जनों देशों की सरकारें बदली हैं. सबसे पहला तो ईरान ही है. तो जहां से मामला शुरू हुआ और जहां आज है, उसी से शुरू करते हैं.

  1. ईरान (1953 – ऑपरेशन अजाक्स):  अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए (CIA) ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेघ का तख्तापलट कर शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी. 1979 तक सब ठीक चला पर शाह की तानाशाही के खिलाफ 1979 में ‘इस्लामी क्रांति’ हुई, जिसके बाद अयातुल्ला अली खामेनेई की सरकार आई. तब से ईरान और अमेरिका के बीच दुश्मनी बरकरार है और अब फिर से जंग जारी है. 
  2. लैटिन अमेरिकी देश (चिली और पनामा): साल 1973 में चिली में अमेरिका समर्थित तख्तापलट में साल्वाडोर अलेंदे को हटाया गया और जनरल पिनोशे का क्रूर सैन्य शासन आया. आज चिली एक स्थिर लोकतंत्र है, लेकिन उस दौर के घाव अभी भी राजनीति को प्रभावित करते हैं. इसी तरह पनामा में 1989 में अमेरिका ने मैनुअल नोरिएगा को हटाने के लिए हमला किया. आज पनामा स्थिर है और आर्थिक रूप से पनामा नहर के कारण मजबूत है. डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में सत्ता में वापसी के बाद पनामा नहर का नियंत्रण वापस लेने की धमकी दी है. उनका तर्क है कि 1977 की संधि गलत थी, चीन का इस पर अनुचित प्रभाव है, और अमेरिकी जहाजों से अत्यधिक शुल्क लिया जा रहा है. ट्रंप इस 82 किमी लंबी रणनीतिक जलमार्ग पर अमेरिका का वर्चस्व बहाल करना चाहते हैं.
  3. अफगानिस्तान (2001 – ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम):  9/11 हमलों के बाद अल-कायदा को पनाह देने के आरोप में अमेरिका ने तालिबान सरकार को हटा दिया.  20 साल के युद्ध और खरबों डॉलर खर्च करने के बाद, 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी होते ही तालिबान ने फिर से सत्ता पर कब्जा कर लिया. आज वहां मानवाधिकारों (खासकर महिलाओं की शिक्षा) की स्थिति बेहद चिंताजनक है और देश गहरे आर्थिक संकट और गरीबी से जूझ रहा है.
  4. इराक (2003 – इराक युद्ध): अमेरिका ने ‘सामूहिक विनाश के हथियारों’ का हवाला देकर हमला किया और सद्दाम हुसैन को सत्ता से बेदखल कर दिया.  सद्दाम के जाने के बाद इराक वर्षों तक गृहयुद्ध और आईएसआईएस (ISIS) के आतंक की चपेट में रहा. आज वहां एक चुनी हुई सरकार है, लेकिन देश अभी भी राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और ईरान-अमेरिका के बीच वर्चस्व की लड़ाई का केंद्र बना हुआ है. बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा की स्थिति अभी भी नाजुक है.
  5. लीबिया : 2011 में ‘अरब स्प्रिंग’ के दौरान अमेरिका और नाटो ने हवाई हमले किए, जिससे मुअम्मर गद्दाफी की सत्ता का अंत हुआ. गद्दाफी की मौत के बाद लीबिया कई सशस्त्र गुटों में बंट गया. वहां लंबे समय तक दो समानांतर सरकारें रहीं. आज भी लीबिया पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाया है और वहां कानून-व्यवस्था की भारी कमी है.
  6. सीरिया: यहां अमेरिका बशर अल-असद सरकार के खिलाफ शुरू से रहा. दिसंबर 2024 में बशर अल-असद के पतन के बाद, अमेरिकी नीति नई अंतरिम सरकार के साथ है और प्रतिबंधों में मामूली ढील दी गई है. जनवरी 2025 से अहमद अल-शरा देश के राष्ट्रपति हैं, लेकिन हालात अभी भी खराब हैं.
  7. बांग्लादेश: बांग्लादेश में हाल ही में सबसे बड़ा छात्र-जनता विद्रोह जुलाई-अगस्त 2024 में हुआ, जिसके कारण 5 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा. यह आंदोलन आरक्षण विरोधी प्रदर्शन के रूप में शुरू हुआ था, जो बाद में सरकार विरोधी व्यापक विद्रोह में बदल गया. इसमें भी आरोप अमेरिकी खुफिया एजेंसियों पर ही लगे. फिलहाल यहां चुनाव के बाद बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार है और तारिक रहमान प्रधानमंत्री हैं.
  8. वेनेजुएला: वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी 2026 की दरमियानी रात को उनके आधिकारिक आवास से एक विशेष सैन्य अभियान (ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व) के तहत उठा लिया था. उन पर मादक पदार्थों की तस्करी (नार्को-टेररिज्म) का आरोप है. मादुरो की गिरफ्तारी के बाद उन्हीं की खास डेल्सी रोड्रिग्ज ने पदभार ग्रहण किया और अब वो अमेरिका की खासमखास हैं.

साफ है अमेरिका ने जब चाहा, जहां चाहा सत्ता बदलवा दी. मगर ऐसा भी नहीं रहा कि वो सत्ता टिकी रही. हां, अमेरिका ने अपनी ताकत जरूर दिखाई और कुछ समय तक उन सरकारों के जरिए उन देशों पर अपना कंट्रोल रखा. इसके जरिए अमेरिका ये भी मैसेज देता है कि उसके खिलाफ जाने वाले नेता या देश को क्या अंजाम भुगतना पड़ सकता है. ईरान अब फिर इसी को झेल रहा है. अयातुल्ला अली खामेनेई के बाद उनके बेटे मुजतबा को सत्ता तो मिल गई, लेकिन अमेरिका ने भी साफ कर दिया है कि वो सत्ता परिवर्तन तक शांत नहीं बैठेगा. 

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