ईरान और अमेरिका की टीम शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान पहुंच चुकी हैं. सुबह से अब तक पाकिस्तान को दोनों ने अपनी-अपनी शर्तें बता दीं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ दोनों टीमों से एक-एक कर बातचीत कर चुके हैं. इसके बाद दोनों ने टीमों ने शर्तों को लेकर पहले आपस में विचार किया और अब आमने-सामने शर्तों में लेन-देन पर बात होगी. ऐसा लगता है कि दोनों पक्ष इस बात को एक-दूसरे को समझाने में कामयाब हो चुके हैं कि लंबा युद्ध दोनों में से किसी के लिए फायदे का सौदा नहीं है.
मगर मुश्किल ये है कि दोनों में विश्वास का इतना संकट है कि किसी को किसी की बात पर भरोसा नहीं है. अमेरिका और ईरान में दुश्मनी का इतिहास काफी पुराना रहा है. पाकिस्तान की मध्यस्थता में 15 दिन के लिए हुए युद्धविराम को लेकर भी ईरान और अमेरिका में मतभेद हैं. ईरान कह चुका है कि लेबनान 15 दिनों के यु्द्धविराम में शामिल था, पाकिस्तान भी इस बात को स्वीकार कर रहा है, मगर अमेरिका और इजरायल इससे इनकार कर चुके हैं. साफ है दोनों देशों में अविश्वास चरम पर है और इसी का उदाहरण अमेरिका से बात करने ईरान के प्रतिनिधिमंडल में शामिल विदेश मंत्री अब्बास अराघची के शनिवार को अपने जर्मन समकक्ष से फोन पर बातचीत से समझा जा सकता है.
जर्मनी के विदेश मंत्री से ईरान के विदेश मंत्री
ट्रंप को समझाने की कोशिश में ईरान
वहीं ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि ईरान पर्दे के पीछे युद्ध रोकने की बात करता है और मीडिया में आकर युद्ध के लिए ललकारता है. साफ है अविश्वास दोनों तरफ से है, मगर फिर भी दोनों इस्लामाबाद में हैं तो जाहिर है दोनों युद्ध को समाप्त करना चाहते हैं. मगर सिर्फ इन दोनों के चाह लेने से युद्ध रुकने वाला नहीं है. अमेरिका का सबसे प्यारा दोस्त इजरायल भी इस युद्ध में पार्टी है पर वो इस शांति वार्ता का हिस्सा नहीं है. ईरान पाकिस्तान के जरिए अमेरिका और खासकर ट्रंप को ये समझाने की कोशिश कर रहा है कि वो अपना फायदा देखें, इजरायल का नहीं.
ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति का बयान
ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ ने कहा है कि इस्लामाबाद में चल रही महत्वपूर्ण वार्ता का परिणाम पूरी तरह से अमेरिका की प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है. आरिफ ने X पर लिखा कि यदि अमेरिकी प्रतिनिधि अपने “अमेरिका फर्स्ट” हितों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौता संभव है. उन्होंने कहा, “हालांकि, यदि हमारा सामना ‘इजरायल फर्स्ट’ के प्रतिनिधियों से होता है, तो कोई समझौता नहीं होगा; हम अनिवार्य रूप से पहले से भी अधिक आक्रामक रूप से अपनी रक्षा जारी रखेंगे, और दुनिया को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.”
तो क्या ईरान हूतियों और हिज्बुल्लाह को छोड़ेगा
मगर फिर अमेरिका हूतियों और हिज्बुल्लाह को लेकर ईरान को कहेगा कि आप हूतियों को छोड़ दो तो क्या ईरान हूतियों पर समझौता करेगा? क्योंकि आज भी जब वार्ता के लिए पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका की टीम पहुंची हुई है तो इजरायल लेबनान पर बम बरसा रहा है. तीन के मरने की भी सूचना है. तो क्या अमेरिका और ईरान जंग को रोकने के लिए इस बात पर राजी होंगे कि इजरायल और हूतियों को एक-दूसरे के लिए छोड़ दिया जाए और जंग को रोक दिया जाए. शायद ऐसा ना तो अमेरिका करेगा और ना ईरान.
शर्तों को मनवाने की गारंटी कौन देगा
दूसरी सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि ईरान चाहता है कि अमेरिका सबसे पहले उसकी फ्रीज संपत्तियों से प्रतिबंध हटा ले और सभी सैंक्शंस को हटा ले. वही अमेरिका चाहता है कि पहले ईरान सबसे पहले होर्मुज को खुला छोड़ दे. अब यहां अविश्वास की बात सबसे ज्यादा है. अगर दोनों ये करना भी चाहें तो पहले आप-पहले आप वाला मामला मीटिंग में उठेगा. कारण दोनों देशों को शर्तें मानने के लिए करने की ताकत तो मध्यस्थ बने पाकिस्तान की है नहीं. दूसरी ओर उसकी बात पर भी कोई बहुत ज्यादा भरोसा दुनिया नहीं करती.
तीसरी इस शांति वार्ता में दिक्कत ये है कि दोनों देश अपनी शर्तों पर युद्ध समाप्त करना चाहते हैं. अमेरिका-इजरायल इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि वो ईरान को परमाणु हथियार नहीं बनाने देंगे. ईरान को अपनी सेना कम करनी होगी और मिसाइल कार्यक्रम को भी धीमा करना होगा. ईरान परमाणु हथियार पर तो राजी है, लेकिन सेना कम करने और मिसाइल कार्यक्रम पर बात भी नहीं करना चाहता. साथ ही अमेरिका इजरायल चाहते हैं कि ईरान हूतियों और हिज्बुल्लाह से दूरी बना ले.
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