11 मार्च को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ऐतिहासिक प्रस्ताव 2817 पारित किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, कतर, ओमान और जॉर्डन पर ईरान के अकारण हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की गई. यह प्रस्ताव 13 मतों के समर्थन से पारित हुआ. किसी भी देश ने इसके खिलाफ वोट नहीं किया. भारत ने न केवल समर्थन में वोट किया, बल्कि उसने इस प्रस्ताव को सह-प्रायोजित भी किया; इस तरह वह उन 135 देशों में शामिल हो गया, जिन्होंने एक ऐसे मसौदे पर अपने हस्ताक्षर किए, जिसमें किसी भी तरह की अस्पष्टता की कोई गुंजाइश नहीं है. ईरान द्वारा बुनियादी ढांचे, आम नागरिकों और संप्रभु क्षेत्र के खिलाफ अंधाधुंध और कायरतापूर्ण हमला अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा है और वैश्विक आर्थिक सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा संकट है.
यह प्रस्ताव एक स्पष्ट और एकजुटता का संदेश देता है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हमारी संप्रभुता पर हमलों या आम लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को जान-बूझकर निशाना बनाए जाने को बर्दाश्त नहीं करेगा.
ईरान ने क्या किया है?
28 फरवरी से, ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात और पड़ोसी देशों के खिलाफ बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज़ मिसाइलों और ड्रोन से लगातार हमले किए हैं. इन हमलों का सबसे ज़्यादा खामियाजा संयुक्त अरब अमीरात को भुगतना पड़ा है. इसे 12 मार्च तक 278 बैलिस्टिक मिसाइलों, 15 क्रूज़ मिसाइलों और 1,540 ड्रोन का सामना करना पड़ा है.
ईरान के दावों, बहानों और सफाइयों के बावजूद, ये सैन्य ठिकानों पर किए गए सटीक हमले नहीं हैं. ईरानी हथियारों ने रिहायशी इलाकों, व्यावसायिक क्षेत्रों और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया है. केवल संयुक्त अरब अमीरात में ही, कई देशों के नागरिक मारे गए हैं और घायल हुए हैं; इनमें एक भारतीय नागरिक भी शामिल है, जिससे यूएई के राष्ट्रपति महामहिम शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने अस्पताल जाकर व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की.
ईरान की यह अकारण, शत्रुतापूर्ण कार्रवाइयां उन देशों के खिलाफ नहीं हैं जिन्होंने उसके साथ युद्ध की घोषणा की थी, बल्कि यह उसके पड़ोसी देशों के खिलाफ है–जिन्होंने तनाव को बढ़ने से रोकने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. संयुक्त अरब अमीरात इस आक्रामकता को सही ठहराने वाले किसी भी तर्क को पूरी तरह से खारिज करता है और इसे ईरान की अदूरदर्शी नीतियों का एक और प्रमाण मानता है. हम किसी भी खतरे का सामना करने के लिए दृढ़ हैं तथा अपनी संप्रभुता, स्थिरता और सुरक्षा की रक्षा करने में पूरी तरह से सक्षम हैं. किसी भी हमले का जवाब जरूर दिया जाएगा और यूएई ऐसे खतरों से निपटने के लिए पूरी तरह से तैयार है.
संयुक्त अरब अमीरात में भारतीयों की सुरक्षा
संघर्ष शुरू होने के बाद से, मैं संयुक्त अरब अमीरात में भारतीय परिवारों और भारत में उनके परिजनों के साथ रोज़ाना संपर्क में हूं. मुझसे बार-बार यही सवाल पूछा जाता है: “क्या हमारे लोग सुरक्षित हैं?” मैं इस समय का उपयोग भारतीय जनता की चिंताओं को दूर करने के लिए करना चाहूंगा.
संयुक्त अरब अमीरात में सभी की सुरक्षा, संरक्षा और कल्याण देश की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है. संयुक्त अरब अमीरात में 200 से अधिक देशों के लोगों रहते हैं, जिसमें एक बड़ा भारतीय समुदाय भी शामिल है, जो शांति और सद्भाव के साथ मिलकर रहते हैं. खुलेपन और स्थिरता की यही भावना आज भी संयुक्त अरब अमीरात की पहचान बनी हुई है. यहां का रोज़मर्रा का जीवन बिना किसी बाधा के चल रहा है. ऊर्जा, जल, दूरसंचार, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाएं और आपूर्ति श्रृंखला जैसी सभी जरूरी सेवाएं पूरी क्षमता से काम कर रही हैं.
महामहिम शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाहयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले सभी नागरिक—चाहे वे अमीराती हों या भारतीय—”वे सभी हमारी जिम्मेदारी हैं.” संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले भारतीय अब केवल अतिथि ही नहीं है, बल्कि उससे कहीं अधिक हैं. वे शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी और श्रमिक हैं, जिनका योगदान हमारे समाज के ताने-बाने में गुंथा हुआ है.
2024 में, सुयंक्त अरब अमीरात भारत में रुपया पैसा भेजने (रेमिटेंस) का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत था; जिसने भारत को मिली कुल 129.4 अरब डॉलर की रिकॉर्ड रकम में से 21.6 अरब डॉलर का योगदान दिया. संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले 40 लाख से ज्यादा भारतीय सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं हैं. वे गर्व के साथ केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और इनके बीच पड़ने वाले हर राज्य के उन परिवारों और समुदायों के सदस्य हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी एक स्थिर, सुचारु रूप से चलने वाले और सुरक्षित संयुक्त अरब अमीरात पर निर्भर करती है. उनकी सुरक्षा हमारी ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे हम बहुत गंभीरता से लेते हैं.
“दुबई के खत्म होने” की भविष्यवाणियों पर एक शब्द
मैंने कुछ जगहों पर आई उन टिप्पणियों को दिलचस्पी से पढ़ा है, जिनमें कहा जा रहा है कि मौजूदा संघर्ष का मतलब दुबई का अंत है, संयुक्त अरब अमीरात के आर्थिक मॉडल का पतन है या फिर बड़े पैमाने पर लोगों के पलायन की शुरुआत है. मैं इन बातों के पीछे की भावना समझता हूं. संघर्ष चिंताजनक होता है, और ऐसी चिंताएं अक्सर सनसनीखेज सुर्खियों की वजह बनती हैं.
मैं तथ्य बताता हूं, संयुक्त अरब अमीरात की अर्थव्यवस्था में अब गैर-तेल क्षेत्र का योगदान 75% जीडीपी तक पहुंच चुका है. हमारे संप्रभु धन कोष (सॉवरेन वेल्थ फंड) के पास 2.49 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की संपत्ति है, जिसकी वजह से संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद संयुक्त अरब अमीरात दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा सॉवरेन वेल्थ धारक है.
कुछ ही दिन पहले एसएंडपी ग्लोबल ने यूएई की AA/A-1+ क्रेडिट रेटिंग को स्थिर दृष्टिकोण के साथ बरकरार रखा. संस्था के अनुसार, 2026 तक यूएई की समेकित शुद्ध परिसंपत्ति स्थिति लगभग जीडीपी के 184% तक पहुंच जाएगी, जबकि सरकार की तरल संपत्तियां लगभग 210% जीडीपी के बराबर होंगी. पिछले पांच वर्षों में हमारा औसत बजट अधिशेष जीडीपी का 5.6% रहा है.
यह ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं है जो दबाव में ढह जाए; यह ऐसी अर्थव्यवस्था है जिसे लंबे समय तक टिके रहने के लिए बनाया गया है.
संयुक्त अरब अमीरात की नींव पांच दशकों के उन नेतृत्वकर्ताओं ने मजबूत की है जिन्होंने अगली तिमाही के लिए नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए योजना बनाई.
संयुक्त अरब अमीरात और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार वित्तीय वर्ष 2024–25 में 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया. जनवरी 2026 में शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान, जो यूएई के राष्ट्रपति हैं, भारत की यात्रा पर आए. इस दौरान दोनों देशों ने 2032 तक इस व्यापार को बढ़ाकर 200 अरब डॉलर करने पर सहमति व्यक्त की. संयुक्त अरब अमीरात आज भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य-देश है.
कुछ टिप्पणीकार जो बहुत सहजता से संयुक्त अरब अमीरात के पतन की भविष्यवाणी कर रहे हैं, उनसे मैं विनम्रता से कहूंगा कि वे 12 महीने बाद अपनी भविष्यवाणियों पर फिर से नजर डालें. निर्माण स्थलों पर क्रेन तब भी चल रही होंगी. हर हफ्ते आने वाली हजारों उड़ानें तब भी उतर रही होंगी और वे लाखों लोग, जिन्होंने यूएई में अपना जीवन बसाने का फैसला किया है, तब भी यहीं होंगे. क्योंकि वे एक बात समझते हैं, जिसे दूर बैठकर टिप्पणी करने वाले लोग कभी-कभी नहीं समझ पाते—यूएई दबाव का डटकर सामना करता है, उसके आगे झुकता नहीं.
आगे क्या?
वर्तमान संकट ने संयुक्त अरब अमीरात को कमजोर नहीं किया है, और न ही करेगा. इसके बजाय, इसने संयुक्त अरब अमीरात की राष्ट्रीय संरचना की मजबूती, संस्थाओं की दृढ़ता, समाज की एकजुटता, और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की शक्ति को सामने लाने का काम किया है. यूएई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि यह एक ऐसा राष्ट्र है जो मजबूत नींव, स्पष्ट दृष्टि, और संकटों का सामना करने की क्षमता के साथ निर्मित है—जहां निर्णय लेने में दूरदर्शिता, बुद्धिमत्ता और गहरी जिम्मेदारी की भावना निहित है.
भारत का प्रस्ताव 2817 के सह-प्रायोजन का निर्णय सिद्धांतों का स्पष्ट संकेत है. यह उस गहरे संबंध को दर्शाता है जो केवल कूटनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे दोनों देशों की जनता के बीच सच्चे साझा जुड़ाव को भी प्रतिबिंबित करता है. यह जुड़ाव विशेष रूप से यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाहयान और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच एक दशक से अधिक समय तक निभाई गई व्यक्तिगत भरोसेमंद मित्रता से विकसित हुआ है.
इस संकट के प्रारंभ से ही भारत ने जो सहानुभूति और एकजुटता दिखाई, वह अनदेखी नहीं रही. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले विश्व नेताओं में से एक थे, जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान को फोन किया और इन हमलों की कड़ी निंदा की. यह बातचीत किसी औपचारिक प्रस्ताव या बहुपक्षीय बयान से पहले की गई थी. यह भाईचारे का संदेश था, और यूएई ने इसे स्पष्ट रूप से समझा.
हम याद रखेंगे कि किसने हमारा समर्थन किया. और जैसा कि हमारे राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान ने कहा, “मैं वादा करता हूं, हम पहले से भी मजबूत होकर उभरेंगे. इसमें कोई संदेह नहीं.”
लेखक परिचय- डॉ. अब्दुल नासिर अलशाली भारत में संयुक्त अरब अमीरात के राजदूत हैं.
डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)


