इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सोमवार को न्याय सुधार पर हुए जनमत संग्रह में अपनी हार स्वीकार कर ली, लेकिन अपनी धुर दक्षिणपंथी नेतृत्व को लगे इस बड़े झटके के बावजूद उन्होंने जोर देकर कहा कि वह पीछे नहीं हटेंगी. रविवार-सोमवार को हुए मतदान में लगभग सभी मतों की गिनती हो चुकी है और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ‘नहीं’ पक्ष को लगभग 54 प्रतिशत वोट मिले, जबकि ‘हां’ पक्ष को मात्र 46 प्रतिशत से थोड़ा अधिक वोट मिले.
चुनाव प्रचार के दौरान, मेलोनी ने जोर देकर कहा था कि न्यायाधीशों और अभियोजकों की भूमिका और निगरानी से संबंधित इस जनमत संग्रह का उनके सरकार के नेतृत्व से कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने सोमवार को भी यही बात दोहराई और कहा, “इटली के लोगों ने फैसला कर लिया है”, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि “इससे सत्ता में बने रहने की हमारी प्रतिबद्धता में कोई बदलाव नहीं आएगा.”
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मेलोनी ने दक्षिणपंथी सरकार में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ मिलकर इन प्रस्तावों के लिए जोरदार प्रचार किया था, जबकि विपक्षी दल इसके खिलाफ आवाज उठा रहे थे. ब्रिटेन के सरे विश्वविद्यालय में राजनीति के प्रोफेसर डैनियल अल्बर्टाजी ने एएफपी को बताया कि मेलोनी के लिए यह बहुत बुरा नतीजा है. उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि उन्होंने अपने घोषणापत्र के एक प्रमुख मुद्दे पर इतालवी मतदाताओं का समर्थन खो दिया है, और यह दक्षिणपंथी दलों के पिछले 30 वर्षों से चले आ रहे प्रमुख प्रस्तावों में से एक है.”
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अक्टूबर 2022 से एक अप्रत्याशित रूप से स्थिर गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही मेलोनी के लिए यह पहली ऐसी हार है, और अगले साल उन्हें संसदीय चुनावों का सामना करना पड़ेगा. अल्बर्टाजी ने कहा, “अगर मध्य-वामपंथी दल एकजुट हो जाते हैं, तो इससे उन्हें मदद मिलेगी. क्योंकि इसका मतलब है कि उनकी अजेय छवि अब नहीं रही.” जनमत संग्रह के हिसाब से मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत अधिक था, लगभग 59 प्रतिशत.
‘बेदखली नोटिस’
रविवार और सोमवार को हुए जनमत संग्रह में न्यायाधीशों और अभियोजकों की भूमिका को अलग करने और उनकी निगरानी करने वाली संस्था को बदलने का प्रस्ताव था. सरकार ने इसे अदालतों में निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय बताया, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह स्वतंत्र न्यायाधीशों पर अधिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास है, जिनके फैसलों पर मेलोनी के मंत्रियों ने अक्सर सार्वजनिक रूप से हमला किया है. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह सुधार इटली की खराब न्याय प्रणाली की वास्तविक चुनौतियों का समाधान करने में विफल रहा है, जिनमें वर्षों तक चलने वाले मुकदमे, लंबित मामलों की भारी संख्या और जेलों में अत्यधिक भीड़ शामिल हैं.राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुधार की जटिलता, जिसे कई इटालियन आसानी से नहीं समझ पाते, और इसके आसपास की बयानबाजी का मतलब यह था कि अंततः यह मतदान स्वयं इतालवी नेता पर जनमत संग्रह बन गया. रोम के लुइस विश्वविद्यालय में राजनीति के प्रोफेसर लोरेंजो कैस्टेलानी ने एएफपी को बताया, “मेलोनी निश्चित रूप से कमजोर हुईं हैं.”
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