नई दिल्ली:
ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग ने दुनिया के बहुत से देशों को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है. मिसाइलें और ड्रोन से सिर्फ जानी नुकसान ही नहीं हो रहा बल्कि आर्थिक संकट भी खड़ा हो गया है. पिछले एक महीने से ज्यादा समय से चल रहे युद्ध की वजह से जमकर बर्बादी हो रही है. दोनों देशों के बीच सीजफायर पर अब सहमति बनी है. अब तक चली जंग से सिर्फ ईरान-इजरायल और अमेरिका ही नहीं अन्य खाड़ी देशों को भी जमकर नुकसान उठाना पड़ रहा है. दुनिया की GDP को अब तक करीब 54.88 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. इस तबाही से वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट तक हर तरफ हाहाकार मचा है.
ईरान में तबाही, मानवीय और आर्थिक मोर्चे पर बड़ी चोट
जंग की सबसे ज्यादा कीमत ईरान चुका रहा है. अमेरिका और इजरायल के मिसाइलों और हवाई हमलों से ईरान को न सिर्फ इंसानी बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी तोड़ कर रख दिया है. बात अगर जान-माल के नुकसान की करें तो ईरान में अब तक 7,300 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और 25,000 से ज्यादा लोग घायल हैं. स्कूल, अस्पताल और ऐतिहासिक इमारतें खंडहर में तब्दील हो चुके हैं. चैथम हाउस की रिपोर्ट में दी गई चेतावनी के मुताबिक, जंग अगर नहीं रुकी तो ईरान की GDP 10% से ज्यादा गिर सकती है, इससे देश कई दशक पीछे चला जाएगा.
जंग से अमेरिका को कितना नुकसान?
ये जंग चल ईरान की धरती पर रही है लेकिन अमेरिका भी कम बर्बाद नहीं हो रहा है. उसकी तिजोरी भी बहुत ही तेजी से खाली हो रही है. CSIS के मुताबिक, इस युद्ध में अब तक अमेरिका के 7.49 लाख करोड़ रुपये ($80.4 बिलियन) स्वाहा हो चुके हैं. ‘फॉर्च्यून’ के विश्लेषण के मुताबिक, अगर यह संघर्ष जारी रहा और ऊर्जा बाजारों और व्यापार में रुकावट जारी रही तो अमेरिका का नुकसान $210 बिलियन (19.2 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है. इस विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका को कुल $115 बिलियन (10.5 लाख करोड़ रुपये) का नुकसान व्यापक और आर्थिक रुकावट की वजह से झेलना पड़ सकता है.
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इज़राइल को कितना नुकसान?
ईरानी हमलों की कीमत इजरायल भी कम नहीं चुका रहा. यहूदी देश में अब तक 33 हजार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं और 7,100 से ज़्यादा लोग घायल हैं. ईरान और हिज़्बुल्लाह (लेबनान) के साथ चल रहे युद्ध की वजह से इजरायल अब तक अपने लगभग 15 अरब डॉलर स्वाहा कर चुका है.
खाड़ी देशों के नुकसान का हिसाब की जान लीजिए
अमेरिका और इजरायल संग जंग की कीमत सिर्फ ईरान ही नहीं बल्कि उसके पड़ोसी अरब देशों को भी चुकानी पड़ रही है. इस जंग की आग की तपिश उन तक भी पहुंच रही है.
कुवैत और कतर: ये जंग अगर अप्रैल के अंत तक चली तो इन देशों की GDP 14% तक गिर सकती है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हमलों की वजह से ये देश पीने के पानी के लिए भी मोहताज हो सकते हैं. हमलों की वजह से 99% पीने का पानी (डीसैलिनेशन प्लांट) खतरे में है. LNG सुविधाओं को भी नुकसान पहुंचा है.
UAE और सऊदी अरब: जंग की वजह से सऊदी की GDP में 3% और हवाई अड्डों, बंदरगाहों और एनर्जी इंफ़्रा पर हुए हमलों की वजह से UAE की GDP में 5% की गिरावट का खतरा बना हुआ है. साथ ही तेल उत्पादन में भी कटौती देखी जा रही है. अकेले UAE के शेयर बाजार को 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा है.
इराक: अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से इराक के तेल क्षेत्रों में उत्पादन 70% तक गिर गया है, इराक की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ है.
बहरीन, सऊदी अरब, ओमान, जॉर्डन: इन देशों में दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है और दर्जनों लेग घायल भी हैं. मिसाइल और ड्रोन हमलों से तेल से जुड़े बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान हुआ है.
लेबनान: ईरान का साथ देने की कीमत लेबनान को भी चुकानी पड़ रही है. उसे जान-माल का नुकसान उठाना पड़ रहा है. लेबनान में अब तक 1,400 से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं और 4,639 लोग घायल हैं. 10 लाख से ज़्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है. इस जंग से लेबनान को आर्थिक मोर्चे पर 14 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है.

जंग का भारतीय बाजार पर क्या असर?
अमेरिका-ईरान जंग का भारत पर सीधा असर तो नहीं हो रहा, लेकिन इसके आर्थिक प्रभाव हर भारतीय की पॉकेट और रसोई तक जरूर पहुंच रहे हैं.
- शेयर बाजार में हाहाकार मचा हुआ है. युद्ध शुरू होने के बाद से भारतीय निवेशकों के करीब 37 लाख करोड़ रुपये डूब चुके हैं.
- अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई राज्यों में LPG (कमर्शियल और डोमेस्टिक) की कमी की खबरें सामने आ रही हैं.
- कथित तौर पर ‘पैनिक बाइंग’ की वजह से देश भर में पेट्रोल पंपों के बाहर लंबी लाइनें देखी जा रही हैं
- प्राइवेट कंपनियों (नायरा, शेल, वगैरह) ने पेट्रोल और डीज़ल के दाम बढ़ा दिए हैं
- भारत सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की बड़ी कमी की घोषणा की, अगर कटौती पूरे साल जारी रहती है तो इससे सरकार को लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा.
- भारत के लिए क्रूड ऑयल का एवरेज प्राइस लगभग दोगुना हो गया है. कच्चा तेल जो फरवरी में $69 प्रति बैरल था, वह अप्रैल 2026 में $125.88 तक पहुंच गया है.
जंग का दुनिया के बाकी देशों पर क्या असर?
युद्ध की वजह से ग्लोबल सप्लाई चेन टूट चुकी है, जिससे दुनिया साल 1973 के तेल संकट से भी बुरे दौर में पहुंच गई है.
पाकिस्तान: पाकिस्तान में स्कूलों को बंद कर ‘वर्क फ्रॉम होम’ लागू किया गया है.
श्रीलंका: श्रीलंका ने तेल बचाने के लिए हर बुधवार सरकारी छुट्टी घोषित कर दी है.
फिलीपींस: फिलीपींस के राष्ट्रपति मार्कोस जूनियर ने ‘नेशनल एनर्जी इमरजेंसी’ का ऐलान कर दिया है.
चीन: चीन ने ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए चीन ने ईंधन के निर्यात पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी है.
महंगाई: सिर्फ पेट्रोल-डीजल के साथ ही बहुत कुछ महंगा
पेट्रोलियम उत्पादों की कमी की वजह से एक ‘डोमिनो इफेक्ट’ पैदा हो गया है. सिर्फ तेल ही महंगा नहीं हुआ है, बल्कि ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने और मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट बढ़ने से काफी कुछ महंगा हो रहा है.
- आपूर्ति में कमी की वजह से उर्वरकों की भी कमी हो रही है, जिससे संभवतः खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी.
- लगभग 60% नेफ्था, जिसका उपयोग प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर, फाइबर और सॉल्वैंट्स के निर्माण में किया जाता है, इसी क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है.
- प्लास्टिक बनाने वाला ‘एथिलीन’ 35% और औद्योगिक रसायन ‘एक्रिलिक एसिड’ 30% महंगा हो गया है. गुजरात के टेक्सटाइल हब में इनपुट कॉस्ट 50% तक बढ़ गई है.
- एक्रिलिक एसिड की कीमतों में 30% से अधिक की वृद्धि हुई है. यह एक महत्वपूर्ण औद्योगिक रसायन है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से चिपकने वाले पदार्थों (adhesives), पेंट और कोटिंग्स, स्वच्छता उत्पादों (डायपर, सैनिटरी पैड), वस्त्रों और चमड़े की फिनिशिंग के उत्पादन में किया जाता है.
- ईंधन और बिजली की बढ़ती लागत के कारण निर्माताओं के लिए परिचालन खर्च बढ़ने लगा है. इसका असर वस्त्र क्षेत्र में, रंगाई, ब्लीचिंग और फिनिशिंग के काम पर देखा जा रहा है. गुजरात में स्थित एक प्रमुख वस्त्र निर्माण संयंत्र ने बताया कि ऐसी कई इनपुट सामग्रियों की कीमतों में लगभग 50% तक की वृद्धि हुई है.
- पॉलिएस्टर की कीमतें पहले ही लगभग 15% बढ़ चुकी हैं, क्योंकि यह पेट्रोकेमिकल्स से प्राप्त होता है.
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