एक था नाटो… शायद कुछ समय बाद इतिहास कि किताबों में ये विषय हो. नाटो (NATO) मतलब नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन एक अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन है. इसकी स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी. सोवियत संघ के खिलाफ इसका गठन किया गया था और लक्ष्य था इसके सदस्यों पर किसी भी हमले का सामूहिक जवाब देना. फिलहाल इसके 32 सदस्य हैं और शुरू से अब तक अमेरिका इसका बॉस है. यूक्रेन जंग जो पिछले चार सालों से चल रही है, उसके केंद्र में भी यही नाटो है. यूक्रेन ने नाटो में शामिल होने का फैसला किया और रूस ने उस पर हमला कर दिया. पुतिन ने यूक्रेन को नाटो से दूर रहने की कई बार चेतावनी दी थी, पर वो नहीं माने.
नाटो में कब कौन जुड़ा
खैर, यूक्रेन तो नाटो में शामिल नहीं हुआ पर अब तो नाटो पर ही संकट है. नाटो की बात करें तो 1949 में इसके 12 संस्थापक सदस्य थे. 1952 में ग्रीस और तुर्की शामिल हुए. 1955 में जर्मनी शामिल हुआ. 1982 में स्पेन शामिल हुआ. 1999 में चेक गणराज्य, हंगरी और पोलैंड शामिल हो गए. 2004 में बुल्गारिया, एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया शामिल हुए. 2009 में अल्बानिया और क्रोएशिया शामिल हुए. 2017 में मोंटेनेग्रो तो 2020 में उत्तरी मैसेडोनिया शामिल हुआ. 2023 में फिनलैंड और 2024 में स्वीडन शामिल हुआ.
यूक्रेन भी इसी ख्वाहिश में हुआ बर्बाद
सब नाटो में इसलिए शामिल हो रहे थे कि अमेरिका का साथ सबको भा रहा था. पता था कि नाटो में शा्मिल होते ही कोई भी देश उस पर हमला करने से पहले 100 बार सोचेगा. कारण ऐसा होने पर खुद अमेरिका उनकी तरफ से युद्ध लड़ने पहुंच जाएगा. यूक्रेन के जेलेंस्की की भी यही ख्वाहिश थी, मगर इससे पहले ऐन वक्त पर पुतिन ने उनका गला पकड़ लिया. आज यूक्रेन पूरी तरह बर्बाद है. बाइडेन तक तो नाटो की तरफ से यूक्रेन को खूब सैन्य साजो-सामान मिले, पर ट्रंप के आते ही इसकी गति धीमी होती गई. ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल में भी नाटो पर गरम थे. उनका मानना था कि नाटो से जुड़े सभी देश अपनी सेना पर खर्च नहीं करते. वो अमेरिका के भरोसे बैठे हैं कि हमला होगा तो अमेरिका तो है ही. कुछ हद तक ये बात सही भी है. नाटो के ज्यादातर देशों का रक्षा बजट बहुत कम है.
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यूरोप का उकसाया, ट्रंप ने सुनाया
ट्रंप जब दूसरी बार राष्ट्रपति बने तो उन्होंने यूक्रेन युद्ध को बकवास बताते हुए जेलेंस्की को समझौते के लिए कहा. ट्रंप का ये चुनावी वादा भी था. मगर जेलेंस्की तो जेलेंस्की ठहरे. जब वो रूस की नहीं माने और अपने ही देश को कब्रिस्तान बना दिया तो ट्रंप की कहां सुनते. उन्होंने ट्रंप के खिलाफ यूरोप को उकसा दिया. यूरोप वाले रहे पुराने जमाने के जमींदार. सो वो भी चौड़े में आ गए और ट्रंप को ही घेरने लगे. सुनाने लगे. ट्रंप ने दो टूक सुना दिया कि नाटो कि जरूरत उन्हें नहीं है. यूरोप वालों को बुरा तो बहुत लगा लेकिन करते भी क्या. अपनी सेना को मजबूत करने की तैयारी शुरू कर दी. अमेरिका के बगैर उनकी ताकत फिलहाल किसी हल्के से देश से भी भिड़ने की भी नहीं है. रही सही कसर ट्रंप ने पहले वेनेजुएला और फिर ईरान पर हमला कर पूरी कर दी. दोनों जगहों पर हमला करने से पहले ट्रंप ने नाटो देशों को जानकारी तक नहीं दी.
ईरान युद्ध में मुंह फुलाना पड़ा भारी

मुंह फुलाए यूरोप ट्रंप के फंसने का इंतजार करता रहा. होर्मुज में जब ट्रंप को मदद की जरूरत पड़ी तो उन्होंने नाटो देशों से अपनी नौसेना भेजने की अपील की. पर किसी ने जवाब नहीं दिया. फिर ट्रंप ने फोन कॉल किए तो भी किसी ने हामी तक नहीं भरी. भड़के ट्रंप ने नाटो देशों को कायर तक कह दिया. आज पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने एक्स पर लिखा, ‘नाटो के पतन का खतरा, रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील, यूरोप में भीषण ऊर्जा संकट, यूक्रेन को दी जाने वाली सहायता का निलंबन और ओर्बन द्वारा कीव को ऋण देने पर रोक – ये सब पुतिन की सपनों की योजना जैसा लगता है.’
पोलैंड के पीएम ने किया ऐलान
The threat of NATO’s break-up, easing sanctions on Russia, a massive energy crisis in Europe, halting aid for Ukraine and blocking the loan for Kyiv by Orbán – it all looks like Putin’s dream plan.
— Donald Tusk (@donaldtusk) April 2, 2026
ये ट्वीट जरूर पोलैंड के प्रधानमंत्री ने किया है, मगर अब ये साफ हो गया है कि नाटो बिखर चुका है, बस इसके ऐलान का इंतजार है. ईरान युद्ध में नाटो देश के नहीं आने के बाद अब ये असंभव ही है कि ट्रंप के रहते अमेरिका नाटो सदस्यों की रक्षा के लिए किसी जंग में कूदेगा. ट्रंप तो इससे भी एक कदम आगे जा चुके हैं और नाटो देशों की तरफ से ईरान युद्ध में मदद नहीं करने पर साफ कर दिया है कि अमेरिका इसे हमेशा याद रखेगा. ऐसे में हो सकता है कि अमेरिका का अगला राष्ट्रपति भी शायद अब नाटो के लिए उतनी गंभीरता ना दिखाए, जितना पहले दिखाया जाता था.
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