लखनऊ:
15 अगस्त 1947 की बात है…दिल्ली की सड़कों पर इंसानों का समंदर उमड़ा पड़ा था क्योंकि आजादी के पहले दिन झंडा फहराया जा रहा था. इस माहौल में आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन अपनी सजी-धजी बग्घी में बैठकर झंडोत्तोलन कार्यक्रम के लिए निकल रहे थे. तभी अचानक भीड़ से एक नारा गूंजने लगा- ‘पंडित माउंटबेटन की जय.’ ब्रिटेन में पले-पढ़े महारानी विक्टोरिया के परपोते माउंटबेटन थोड़ा-बहुत तो भारत से परिचित थे लेकिन इस नारे ने उन्हें भी अचंभे में डाल दिया. उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से हैरानी से पूछा कि आखिर भीड़ उन्हें ‘पंडित’ क्यों बुला रही है? तब नेहरू ने मुस्कुराते हुए समझाया था कि भारत में ‘पंडित’ का मतलब महज कोई जाति नहीं, बल्कि यह विद्वत्ता और ऊंचे चरित्र के प्रति समाज का गहरा सम्मान है. लोग आपको बहुत प्यार और इज्जत दे रहे हैं, इसलिए आपको इस नाम से पुकार रहे हैं. डोमिनिक लैपियर और लैरी कॉलिन्स की मशहूर किताब ‘आधी रात को आजादी’ में दर्ज यह किस्सा बताता है कि ‘पंडित’ शब्द की गरिमा कितनी ऊंची रही है.
खाकी की परीक्षा में ‘पंडित’ पर बवाल
लेकिन आज उसी ‘पंडित’ शब्द को यूपी पुलिस की दरोगा भर्ती परीक्षा में ‘अवसरवादी’ (मौकापरस्त) का पर्यायवाची बता दिया गया है. 14 मार्च को हुए पेपर में सवाल पूछा गया कि “अवसर के अनुसार बदलने वाले व्यक्ति” को क्या कहते हैं और विकल्पों में ‘अवसरवादी’ के साथ ‘पंडित’ को भी शामिल कर दिया गया. जैसे ही यह खबर बाहर आई, बवाल मच गया. सवाल ये है कि जो शब्द सनातन संस्कृति में सम्मान का प्रतीक रहा है उसे आज सरकारी इम्तिहान में ‘मौकापरस्त’ जैसा अर्थ कैसे दे दिया गया? इसका जवाब तो प्रश्नपत्र को सेट करने वाले ‘पंडित’ ही दे सकते हैं फिलहाल हम कुछ तथ्यों पर नजर डाल लेते हैं.
शास्त्रों की कसौटी पर ‘पंडित’ का अर्थ
अगर हम हिंदी शब्दकोश या डिक्शनरी उठाकर देखें, तो ‘पंडित’ शब्द का अर्थ कहीं भी ‘अवसरवादी’ या ‘गिरगिट की तरह रंग बदलने वाला’ नहीं मिलता. शास्त्रों में पंडित उसे कहा गया है जिसके पास ‘पंडा’ यानी बुद्धि हो. ‘पंडा’ का अर्थ होता है विवेक या सही-गलत का फैसला करने की क्षमता. श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के 18वें श्लोक में लिखा है- विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनी. शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:. इसका सीधा मतलब है कि जो विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में एक ही तत्व (परमात्मा) को देखे, वही असली ‘पंडित’ है. यानी पंडित होने की पहली शर्त ‘समदर्शी’ होना है, अवसरवादी होना नहीं.
दधिचि की हड्डियों से आजाद की पिस्तौल तक
इतिहास को पलटें तो समझ आता है कि ‘पंडित’ होना अवसरवादिता नहीं, बल्कि समाज के लिए खुद को गला देने का नाम है. पौराणिक काल में महर्षि दधिचि इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. जब देवलोक पर संकट आया, तो उन्होंने लोक कल्याण के लिए अपनी हड्डियां तक दान कर दीं ताकि असुरों का नाश हो सके. क्या अपनी देह का त्याग करने वाले को अवसरवादी कहा जा सकता है? बिल्कुल नहीं. यही अडिगता हमें आधुनिक इतिहास में भी दिखती है. पेशवा बाजीराव ने 40 से ज्यादा युद्ध लड़े और कभी अपनी तलवार को झुकने नहीं दिया. उन्होंने सत्ता के लिए सिद्धांतों से समझौता नहीं किया, बल्कि मराठा साम्राज्य की मर्यादा को सर्वोपरि रखा. मंगल पांडे हों या रानी लक्ष्मीबाई के सलाहकार रहे पंडितों की टोली, इन सबने साबित किया कि पंडित होना चुनौतियों से भागना नहीं बल्कि उनके सामने ढाल बनकर खड़े होना है. कला और संगीत के क्षेत्र में भी पंडित भीमसेन जोशी, पंडित जसराज और पंडित रविशंकर जैसे दिग्गजों ने अपनी पूरी उम्र सुरों की साधना में गुजार दी, न कि निजी फायदे के लिए अपने सुर बदले.
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निष्पक्षता की कलम होनी चाहिए
दरअसल पंडित होने का असली मतलब समाज को गढ़ना और दिशा देना रहा है. कश्मीर के महान विद्वान कल्हण ने जब ‘राजतरंगिणी’ लिखी, तो उन्होंने साफ कहा कि एक सच्चे लेखक या पंडित को राग-द्वेष से ऊपर उठकर निष्पक्ष रहना चाहिए. उन्होंने इतिहास की सच्चाई के लिए कभी किसी राजशाही की चापलूसी नहीं की. हाल ही में जब मनोज वाजपेयी की फिल्म का नाम ‘घूसखोर पंडित’ रखा गया, तब भी विवाद की वजह यही थी कि आप ज्ञान और त्याग के प्रतीक शब्द को किसी भी नकारात्मक विशेषण के साथ नत्थी नहीं कर सकते. ऐसे में दरोगा भर्ती जैसे संजीदा इम्तिहान के पेपर में इसे ‘मौकापरस्त’ के बराबर खड़ा कर देना भारी लापरवाही है.
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शब्दों की मर्यादा और सामाजिक ताना-बाना
बात सिर्फ एक शब्द की नहीं है. मेरी उपर कही गई बात मतलब यह कतई नहीं है कि समाज में सिर्फ पंडित ही श्रेष्ठ हैं. भारत की खूबसूरती ही यही है कि यहां हर जाति और हर वर्ग का अपना गौरवशाली इतिहास और देश के निर्माण में अतुलनीय योगदान रहा है. चाहे वो दलित समाज के महापुरुष हों, पिछड़ों का संघर्ष हो या आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन के लिए बलिदान, हर किसी ने इस मिट्टी को सींचा है. ऐसे में किसी भी जाति विशेष को निशाना बनाना या उसके प्रतीकों का मजाक उड़ाना कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता. परीक्षा का सवाल हो या सिनेमा का पर्दा, हमें यह याद रखना होगा कि शब्दों की अपनी मर्यादा होती है और उन्हें चोट पहुंचाना समाज के ताने-बाने को कमजोर करता है.


