खतरे की घंटी! होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल-गैस ही नहीं AI और MRI की भी हवा भी न निकल जाए

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नई दिल्ली:

पाकिस्तान की मध्यस्थता में शनिवार को अमेरिका और ईरान में समझौते की कोशिश हुई. लेकिन बातचीत बेनतीजा रही. दोनों देश अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं. इस वजह से होर्मुज स्ट्रेट का संकट और गहरा गया है. अमेरिका-इजरायल के 28 फरवरी के हमले के बाद से ईरान ने इस समुद्री रास्ते को बंद कर रखा है. इस वजह से उसकी इजाजत के बिना इस रास्ते से कोई जहाज आ-जा नहीं पा रहा है. इसका असर दुनिया को होने वाली तेल और गैस की आवाजाही पर पड़ा है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से केवल तेल-गैस की आवाजाही ही नहीं बल्कि कुछ धातुओं और रसायनों का आवागमन भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है. आइए हम आपको ऐसे ही तीन धातुओं और रासायनिक तत्वों के बारे में बताते हैं कि जिनका बाजार होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से प्रभावित हुआ है. ये धातुएं और रासायनिक पदार्थ युद्ध में काम आने वाले साजो सामान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.  

होर्मुज से पैदा हुआ हीलियम का संकट

होर्मुज स्ट्रेट को हम तेल, तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और रासायनिक खाद की आवाजाही के लिए ही जरूरी मान रहे हैं. लेकिन यह एमआरआई मशीन, सेमीकंडक्टर (चिप) बनाने और एयरोस्पेस (हवाई-अंतरिक्ष उद्योग) के लिए भी उतना ही जरूरी है. हीलियम गैस आधुनिक अर्थव्यवस्था और सेना को चलाने में अहम भूमिका निभाती है. यह गैस एमआरआई मशीनों के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को ठंडा रखती है, चिप बनाने में मदद करती है, एयरोस्पेस में लीकेज जांच और दबाव बनाए रखने में इस्तेमाल होती है और कई दूसरी औद्योगिक प्रक्रियाओं में भी काम आती है.

हीलियम गैस सबसे अधिक कहां पैदा होती है. 

हीलियम एक ऐसी गैस है, जिसे स्टोर करना थोड़ा मुश्किल होता है. इस गैस से तरल बनाने के बाद यह धीरे-धीरे करके उड़ जाती है. यह करीब 45 दिन में काफी खत्म हो जाती है. इस वजह से अगर इसकी सप्लाई रुक जाए, तो स्टॉक धीरे-धीरे खत्म नहीं होता बल्कि गायब हो जाता है.ईरान युद्ध की वजह से दुनिया में हीलियम की आवाजाही पर असर पड़ा है. 12 मार्च के बाद कतर में गैस प्रोसेसिंग रुकने से हर महीने करीब 5.2 मिलियन क्यूबिक मीटर हीलियम बाजार नहीं पहुंच पा रही है. इससे उसकी सप्लाई बाधित हुई है और कीमतें दोगुनी हुई हैं. ऐसा इसलिए है कि कतर दुनिया के सबसे बड़े हीलियम सप्लायर में से एक है. कतर के रास लाफान में दुनिया का सबसे बड़ा हीलियम प्लांट है.साल 2025 में दुनिया में करीब 190 मिलियन क्यूबिक मीटर हिलियम का उत्पादन हुआ. इनमें से 81 मिलियन का उत्पादन अमेरिका और  63 मिलियन का उत्पादन कतर ने किया था. इससे साफ है कि ये दोनों देश हीलियम के बाजार पर बड़ा प्रभाव रखते हैं.

हीलियम की कमी का असर

आमतौर पर ऐसी मान्यता है कि AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) केवल सॉफ्टवेयर का मामला है. लेकिन असल में यह भारी उद्योगों पर निर्भर है. इसके लिए चिप (सेमीकंडक्टर), डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग पावर बहुत जरूरी होता है. इस तरह से इसके पीछे एक पूरा औद्योगिक सिस्टम काम करता है. इसमें गैस,रसायन,मशीनें और लॉजिस्टिक्स शामिल है. हीलियम इस सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है. सेमीकंडक्टर बनाने के लिए हीलियम की जरूरत पड़ती है. AI के बढ़ते उपयोग के लिए ज्यादा चिप की जरूरत होगी. इसका ज्यादा दबाव मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम पर पड़ेगा. इसलिए हीलियम उतना ही जरूरी है जितना बिजली, मशीनें और उत्पादन क्षमता. इसके अलावा हीलियम की कमी का असर रक्षा (Defense) के क्षेत्र पर भी पड़ेगा. मिसाइल, विमान और सैटेलाइट निर्माण, लीकेज जांच, वेल्डिंग और नियंत्रित वातावरण, फाइबर ऑप्टिक्स और संचार सिस्टम, ये सभी आधुनिक सैन्य सिस्टम के लिए जरूरी हैं. ऐसे में अगर हीलियम की कमी हो जाए तो पूरा रक्षा उत्पादन सिस्टम प्रभावित हो सकता है.

सल्फर का बाजार 

होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना एक और रसायन का व्यापार प्रभावित कर रहा है, वह है सल्फर. इसी समुद्री गलियारे से होकर दुनिया के करीब 50 फीसदी सल्फर का आवागमन होता है. अमेरिका अपने लिए पर्याप्त रूप से सल्फर का उत्पादन करता है. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से समुद्री सल्फर व्यापार जटिल हो गया है. अमेरिकी सल्फर की कीमतें 165 फीसदी बढ़कर 650 डॉलर प्रति मीट्रिक टन से अधिक हो गई हैं. ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से ही सल्फर की कीमत में 25 फीसदी की वृद्धि हो चुकी है.

अमेरिका करीब  90 फीसदी सल्फर का उपयोग सल्फ्यूरिक एसिड के रूप में करता है. सल्फ्यूरिक एसिड ऐसा पदार्थ है, जो न केवल आर्थिक कार्यप्रणाली को बनाए रखता है, बल्कि आधुनिक युद्ध संचालन को भी. ऐसा इसलिए है क्योंकि सल्फ्यूरिक एसिड बिजली ग्रिड में तांबे से लेकर सटीक निशाने लगाने वाले हथियारों के सेमीकंडक्टर तक में इसकी जरूरत पड़ती है. सल्फ्यूरिक एसिड जैसे रसायन का इस्तेमाल तांबे के निष्कर्षण (Copper Extraction), बैटरी सामग्री के प्रसंस्करण और सेमीकंडक्टर निर्माण से पहले के चरण में होता है. इसका मतलब यह हुआ कि सल्फर यह तय कर सकता है कि अमेरिकी सेना उन बिजली और डिजिटल प्रणालियों के औद्योगिक उत्पादन को बनाए रख सकती है या नहीं.

सल्फर और तांबा का संबंध 

तांबा एक रणनीतिक सामग्री है. इसका उपयोग ट्रांसफॉर्मर, मोटर और संचार उपकरण बनाने में होता है. होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना तांबा के लिए समस्या बन रहा है. तांबे के इस संकट का असर सैन्य तैयारी पर पड़ सकता है. इसी तरह निकल और कोबाल्ट भी इस संकट में पड़ सकते हैं. अयस्क से इन दोनों का निकाला जाना सल्फ्यूरिक एसिड आधारित प्रक्रियाओं पर निर्भर है. इस प्रक्रिया को उच्च-दबाव एसिड लीचिंग कहते हैं. ये दोनों जेट इंजन के उच्च-ताप मिश्रधातुओं और लिथियम-आयन बैटरियों के लिए महत्वपूर्ण हैं. ये बैटरियां ही ड्रोन और सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स को ताकत देती हैं. इसके अलावा अत्यधिक शुद्ध सल्फ्यूरिक एसिड सिलिकॉन वेफर को साफ करने और काटने (Etching) के लिए जरूरी है. इससे अच्छे किस्म का माइक्रोचिप बनता है. यह माइक्रोचिप एफ-35 जैसे विमान से लेकर मिसाइल सिस्टम तक में उपयोग होता हैं. इसलिए सल्फर की कमी अमेरिकी सैन्य डिजिटल प्रणाली के लिए एक वास्तविक खतरा है.

एल्यूमिनियम का बाजार

एल्यूमिनियम का इस्तेमाल विमान, बख्तरबंद वाहनों, नौसैनिक प्रणालियों और गोला-बारूद के निर्माण में किया जाता है. लेकिन ईरान युद्ध ने एल्यूमिनियम के बाजार को प्रभावित किया है. युद्ध की वजह से एल्यूमिनियम की कीमत में 10 फीसद तक की बढ़ोतरी हुई है. दरअसल खाड़ी देशों की अंतरराष्ट्रीय एल्यूमिनियम उत्पादन में हिस्सेदारी नौ फीसदी है. लेकिन ईरानी हमलों ने खाड़ी के दो बड़े एल्यूमिनियम उत्पादकों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई)की अमीरात ग्लोबल एल्युमिनियम और बहरीन की एल्युमिनियम बहरीन को नुकसान पहुंचाया है. इससे लंदन मेटल एक्सचेंज में एल्यूमिनियम की कीमतें बढ़कर 3,492 पाउंड प्रति मीट्रिक टन तक पहुंच गई हैं. यह करीब चार साल का उच्चतम स्तर है. यह हमला ऐसे समय हुआ जब एल्यूमिनियम बहरीन पहले ही अपनी 19 फीसदी क्षमता की लाइनों को बंद कर चुका था. लंदन मेटल एक्सचेंज मान्य गोदामों में भंडार करीब 60 फीसदी घटकर केवल 4,18,675 टन रह गया था.

खाड़ी के देश अपने कुल एल्यूमिनियम उत्पादन का करीब 75 फीसदी निर्यात करते हैं. उदाहरण के लिए पिछले साल यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका ने क्रमशः 1.2 मिलियन और 3.4 मिलियन टन आयात किया. चीन वैश्विक उत्पादन में 60 फीसदी के साथ टॉप पर है. लेकिन वह अपने उत्पादन का अधिकांश हिस्सा खुद या तो इस्तेमाल करता है या उसे स्टोर कर लेता है. वहीं पश्चिमी खरीदार पिछले कई सालों से रूस पर अपनी निर्भरता कम कर रहे हैं. इससे राजनीतिक और व्यावसायिक रूप से स्वीकार्य एल्यूमिनियम का बहुत छोटा भंडार बचता है. ऐसे में हॉर्मुज का बंद होना गैर चीनी एल्यूमिनियम आपूर्ति के करीब एक चौथाई हिस्से को खतरे में डालता है. हर साल पांच मिलियन मीट्रिक टन से अधिक एल्यूमिनियम हॉर्मुज से गुजरता है.अमेरिका और यूरोप अपनी जरूरत का आधे से अधिक एल्यूमिनियम आयात करते हैं. इसका 20 फीसदी से अधिक मध्य पूर्व से आता है. 

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