10 साल में चार गुना बढ़ी मुस्लिम आबादी, जापान में मस्जिदों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा, फुजीसावा में सड़कों पर उतरे लोग

10 साल में चार गुना बढ़ी मुस्लिम आबादी, जापान में मस्जिदों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा, फुजीसावा में सड़कों पर उतरे लोग 10 साल में चार गुना बढ़ी मुस्लिम आबादी, जापान में मस्जिदों की संख्या में रिकॉर्ड इजाफा, फुजीसावा में सड़कों पर उतरे लोग

नई दिल्ली:

पिछले एक दशक में जापान में मुस्लिम आबादी और धार्मिक ढांचे में तेज बढ़ोतरी देखी गई है. इसी पृष्ठभूमि में जापान के तटीय शहर फुजीसावा में प्रस्तावित मस्जिद के निर्माण को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में हजारों स्थानीय निवासियों को शहर की पहली मस्जिद के खिलाफ नारे लगाते और तख्तियां उठाए देखा जा सकता है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रस्तावित मस्जिद का आकार आसपास के ऐतिहासिक शिंतो मंदिरों से बड़ा है, जिससे क्षेत्र की पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकती है. प्रदर्शनकारियों ने इसे जापानी परंपराओं के लिए ‘उकसावे’ जैसा कदम बताया. मस्जिद परियोजना को लेकर हुई सार्वजनिक बैठकों में भी तनाव बना रहा, कई बार स्थिति संभालने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा.

जापान में मस्जिद पर बवाल

विरोध के जवाब में ‘फुजीसावा मस्जिद’ से जुड़े एक प्रतिनिधि ने कहा, ‘हम जापान से प्यार करते हैं और सभी नियमों और कानूनों का पालन करेंगे.’ हालांकि, इस बयान के बावजूद स्थानीय आबादी की चिंताएं पूरी तरह शांत नहीं हुई हैं.

मुस्लिम आबादी और मस्जिदों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब जापान में मुस्लिम आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तानादा के अनुमानों के मुताबिक, 2024 के अंत तक जापान में मुसलमानों की संख्या करीब 4.2 लाख हो गई, जबकि 2010 में यह आंकड़ा लगभग 1.1 लाख था. इनमें से करीब 90 प्रतिशत विदेशी नागरिक हैं, जबकि शेष जापानी मूल के धर्मांतरित या मिश्रित पृष्ठभूमि से आते हैं.

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इसी के साथ मस्जिदों की संख्या में भी तेज इजाफा हुआ है. 2008 में जहां जापान में करीब 50 मस्जिदें थीं, वहीं जुलाई 2025 तक यह संख्या बढ़कर 160 से अधिक हो चुकी है. टोक्यो, ओसाका, नागोया और योकोहामा जैसे बड़े शहरों में मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत अधिक है.

आर्थिक जरूरत और इमिग्रेशन

विशेषज्ञों के मुताबिक मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी सीधे तौर पर जापान की आर्थिक जरूरतों से जुड़ी है. घटते कार्यबल और बुजुर्ग होती आबादी के बीच सरकार ने विदेशी श्रमिकों के लिए रास्ते खोले हैं. इंडोनेशिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और ईरान जैसे देशों से आए प्रवासी खासकर नर्सिंग, केयरगिविंग और तकनीकी क्षेत्रों में काम कर रहे हैं.

आपत्तियों की असल वजहें

स्थानीय विरोध के पीछे केवल मस्जिद निर्माण ही नहीं, बल्कि अंतिम संस्कार की परंपराएं, शोर, भीड़भाड़ और शहरी ढांचे पर दबाव जैसी चिंताएं भी प्रमुख हैं. जापान में जहां 99 प्रतिशत से अधिक मामलों में शवदाह किया जाता है, वहीं इस्लाम में दफन की परंपरा है. सीमित कब्रिस्तानों और पर्यावरण को लेकर भी आपत्तियां उठाई गई हैं.

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सरकार की स्थिति

जापान के संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी है. स्थानीय प्रशासन का कहना है कि यदि मस्जिद परियोजना तमाम निर्माण और ज़ोनिंग नियमों का पालन करती है, तो इसे रोकना कानूनी रूप से आसान नहीं होगा. वहीं सख्त इमिग्रेशन और ‘जापान फर्स्ट’ नीति की वकालत करने वाले राजनीतिक दलों को भी इस मुद्दे पर समर्थन मिलता दिख रहा है.

फुजीसावा का मामला अब सिर्फ एक मस्जिद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जापान में बदलती जनसांख्यिकी, इमिग्रेशन नीति और सांस्कृतिक पहचान को लेकर चल रही बड़ी बहस का प्रतीक बनता जा रहा है.







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