झाड़ू से ‘जुगाड़’ तक: आम आदमी पार्टी की कहानी या एक लंबा राजनीतिक नाटक?

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एक समय था जब आम आदमी पार्टी सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं थी, यह एक भावना थी, एक विद्रोह था, एक भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ नैतिक विरोध था. यह रामलीला मैदान की धूल से उभरी, अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले आंदोलन से प्रेरित थी, जिसमें अरविंद केजरीवाल सबसे प्रमुख चेहरा थे, लेकिन यहीं से कहानी में मोड़ आता है, दिलचस्प और कुछ हद तक विडंबनापूर्ण तरीके से. क्योंकि ‘व्यवस्था बदलने’ के उद्देश्य से शुरू हुआ आंदोलन धीरे-धीरे उसी व्यवस्था जैसा दिखने लगा, जिसका उसने कभी विरोध किया था.

शुरुआती दरारें दिखीं, जब एक्टिविजम राजनीति में बदली, अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए. विरोध की सादगी सत्ता की रणनीति में बदल गई. बाबा रामदेव जैसे सहयोगी भी अलग हो गए. नैतिक निरपेक्षता की भाषा राजनीतिक सुविधा के व्याकरण में बदल गई और फिर आया पहला बड़ा विरोधाभास, राजनीति में, “कभी नहीं” अक्सर चुपचाप “कभी-कभी” बन जाता है.

वही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जिस पर तीखे हमले हुए, वही सरकार बनाने के लिए समर्थन प्रणाली बन गई. सोनिया गांधी, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता, जिन्हें कभी जेल भेजने का निशाना बनाया गया था, अचानक AAP के राजनीतिक परिवेश का हिस्सा बन गए, जिसमें AAP ने कुशलता से काम करना सीखा.

विरोधाभास यहीं नहीं रुके, एक समय एम. के. स्टालिन की तीखी आलोचना हुई और बाद में, सार्वजनिक रूप से उनके प्रति मित्रता दिखाई दी. यह बदलाव छोटा नहीं था; यह एक व्यापक परिवर्तन का संकेत था. एक पार्टी जो कभी खुद को ‘अलग’ होने का दावा करती थी, अब जानी-पहचानी सी लगने लगी थी.

AAP की राजनीति ने एक विचित्र लय विकसित कर ली, आरोपों का तूफान, उसके बाद समाधान की चुप्पी. शक्तिशाली हस्तियों पर बड़े-बड़े आरोप लगाए गए, लेकिन शायद ही कभी उन्हें उनके तार्किक कानूनी निष्कर्ष तक पहुंचाया गया, और नितिन गडकरी तथा अरुण जेटली के खिलाफ जिन दो मामलों में केस बढ़ा, उनमें सार्वजनिक माफी ने एक अप्रत्याशित अंत का संकेत दिया.

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यह एक ऐसी पार्टी थी जिसने “सबूतों पर आधारित भ्रष्टाचार-विरोधी” वादे किए थे, लेकिन अक्सर “माफी मांगकर मामले को खत्म करने” पर ही रुक जाती थी. फिर सत्ता आई और उसके साथ ही जांच-पड़ताल भी शुरू हो गई.

दिल्ली में शासन व्यवस्था को मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा सुधार जैसे वादों के माध्यम से पेश किया गया, लेकिन इन पर भी आलोचना और प्रतिवाद हुए. यमुना नदी को टेम्स नदी जैसी नदी में बदलने का वादा धीरे-धीरे एक वास्तविक परिवर्तन के बजाय केवल एक वाक्पटुता बनकर रह गया.

प्रदूषण के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल बदल गया. शुरुआत में पंजाब पर निशाना साधा गया और बाद में जब पंजाब आम आदमी पार्टी के नियंत्रण में आया, तो आरोप दूसरी ओर मोड़ दिए गए. समस्या वही रही, केवल बहाना बदल गया.

इसी बीच, भ्रष्टाचार के आरोप सामने आने लगे, शराब नीति विवाद, प्रशासनिक प्रश्न और अब व्यापक रूप से चर्चित “शीश महल” विवाद, जो पार्टी की सादगी और मितव्ययिता की मूल छवि के बिल्कुल विपरीत. 

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फिर शुरू हुई आंतरिक कहानी. संभवतः सबसे खुलासा करने वाला अध्याय. एक पार्टी जिसने कभी आंतरिक लोकतंत्र का समर्थन किया था, उसमें प्रमुख आवाजों का धीरे-धीरे बाहर निकलना या हाशिए पर चले जाना देखा गया. प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, आशुतोष, कुमार विश्वास शुरुआती बाहर निकलने वालों में से थे. बाद में, स्वाति मालीवाल जैसी हस्तियों से जुड़े तनावों ने इस कहानी को और भी जटिल बना दिया.

राजनीति में यह कोई असामान्य बात नहीं है, लेकिन यहां, इसमें एक तीखी विडंबना थी, क्योंकि यह वही पार्टी थी जिसने दूसरों की “हाई कमांड कल्चर” के लिए आलोचना की थी. एक पैटर्न उभरने लगा, कोई भी नेता जो बहुत प्रमुख हो जाता था, वह अरविंद केजरीवाल के लिए असुविधाजनक बन जाता था और इसी क्रम में, आम आदमी पार्टी उन्हीं राजनीतिक ढांचों जैसी दिखने लगी, जिनका उसने कभी विरोध किया था.

शायद सबसे बड़ा विरोधाभास यही है- एक आंदोलन जो “राजनीतिक नाटक” के खिलाफ विद्रोह के रूप में शुरू हुआ था, धीरे-धीरे उसी का निरंतर प्रदर्शन बन गया.

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विरोध प्रदर्शन – अपनी ही सरकार के खिलाफ
आरोप – जिनका कोई हल नहीं निकला
वादे – हर चुनाव चक्र के साथ बढ़ते गए

शासन और नाटक के बीच की रेखा धुंधली हो गई.

आज सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आम आदमी पार्टी कहां खड़ी है. गहरा सवाल यह है- जिस विचार का उसने कभी प्रतिनिधित्व किया था, उसका क्या हुआ? और यहीं से कहानी अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर पहुंचती है.

राघव चड्ढा, स्वाति मालीवाल, हरभजन सिंह से जुड़े हालिया घटनाक्रम, साथ ही कई सांसदों के पार्टी से अलग होने या पार्टी छोड़ने की खबरें, सामान्य राजनीतिक उथल-पुथल से कहीं अधिक गंभीर संकेत देती हैं और शायद यही इस यात्रा का सबसे तीखा निष्कर्ष है.

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भ्रष्टाचार के खिलाफ जन्मा एक आंदोलन अब विश्वसनीयता के सवालों से जूझ रहा है और अगर यही सिलसिला जारी रहा, तो इतिहास इसे एक साहसिक राजनीतिक प्रयोग के रूप में नहीं, बल्कि एक अधूरे वादे के रूप में याद रखेगा. एक ऐसा वादा जिसका अंतिम अध्याय जीत में नहीं, बल्कि विदाई में लिखा जा रहा है.

राघव चड्ढा का जाना शायद अरविंद केजरीवाल द्वारा कभी खड़ी की गई राजनीतिक मुहिम के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है.

(डिस्क्लेमर: लेखक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बायोग्राफर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)



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