88 बाघ मरे, मौत का कारण तक नहीं पता – RTI ने खोली ‘टाइगर प्रोटेक्शन’ की भयावह पोल | 88 tigers dead, cause of death unknown

88 बाघ मरे, मौत का कारण तक नहीं पता - RTI ने खोली ‘टाइगर प्रोटेक्शन’ की भयावह पोल | 88 tigers dead, cause of death unknown 88 बाघ मरे, मौत का कारण तक नहीं पता - RTI ने खोली ‘टाइगर प्रोटेक्शन’ की भयावह पोल | 88 tigers dead, cause of death unknown

भारत दुनिया को बाघ संरक्षण का मॉडल दिखाता है. हर कुछ साल में बाघों की बढ़ती संख्या का जश्न मनाया जाता है. जंगलों, रिजर्वों और संरक्षण योजनाओं पर करोड़ों खर्च होने के दावे किए जाते हैं. लेकिन सूचना के अधिकार कानून से निकले दस्तावेजों ने इस चमकदार दावे के पीछे छिपी एक ऐसी भयावह सच्चाई उजागर की है, जो देश की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है.

2020 और 2021 में देशभर में हुई 88 बाघों की मौतें आज तक रहस्य बनी हुई हैं. पांच साल बीत गए, लेकिन इन मौतों का अंतिम कारण तय नहीं हो सका. न जांच पूरी हुई, न जिम्मेदारी तय हुई, न अपराधियों तक पहुंच बनी. और अब, जवाब तलाशने के बजाय राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी NTCA इन मामलों की फाइलें बंद करने की तैयारी में है.

मौत की वजह वाला कॉलम आज भी खाली 

सूचना के अधिकार के तहत मिले दस्तावेज बताते हैं कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, असम, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे प्रमुख बाघ राज्यों में इन मौतों को “US” यानी Under Scrutiny या Unnatural कहकर दर्ज किया गया, लेकिन मौत की वजह वाला कॉलम आज भी खाली है. यानी रिकॉर्ड में मौत दर्ज है, लेकिन सच गायब है.

एमपी में भी तेजी से मर रहे हैं बाघ 

मध्य प्रदेश, जिसे देश में टाइगर स्टेट का तमगा हासिल है, इस शर्मनाक बैकलॉग में सबसे आगे है. बांधवगढ़, कान्हा और पन्ना जैसे देश के सबसे महत्वपूर्ण ब्रीडिंग ग्राउंड में हुई बाघ मौतों के मामलों में भी अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला. ये वे इलाके हैं जिन्हें बाघों के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता है. लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि यहां भी बाघ मर रहे हैं और सिस्टम पांच साल बाद भी नहीं बता पा रहा कि कैसे.

संरक्षण क्षेत्रों के बाहर बाघों की सुरक्षा चुनौती

महाराष्ट्र में ताडोबा-अंधारी और चंद्रपुर के मामले और भी गंभीर तस्वीर पेश करते हैं. यहां कई मौतें टाइगर रिजर्व के बाहर हुईं, जहां निगरानी कमजोर और शिकार का खतरा अधिक होता है. इसका मतलब है कि संरक्षण क्षेत्रों के बाहर बाघों की सुरक्षा लगभग खुली चुनौती बनी हुई है. असम का काजीरंगा, जिसे दुनिया के सबसे सख्त संरक्षित वन क्षेत्रों में गिना जाता है, वहां भी 2020 से कई बाघ मौतें आज तक अनसुलझी हैं. 

 सिस्टम की सुस्ती से शिकारियों को मिल रही  सुरक्षा 

कर्नाटक के नागरहोल और उत्तर प्रदेश के दुधवा में “सीज़र” के रूप में दर्ज कई मामले और भी खतरनाक संकेत देते हैं. “सीज़र” का अर्थ है कि बाघ के अंग या अवशेष बरामद हुए, यानी शिकार की आशंका स्पष्ट थी. लेकिन यदि ऐसे मामलों में भी कानूनी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा गया, तो इसका अर्थ साफ है शिकारियों को सिस्टम की सुस्ती से सुरक्षा मिल रही है.

मौतों की फॉरेंसिक रिपोर्ट तक पांच साल बाद पूरी नहीं 

उत्तराखंड में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, रामनगर और श्यामपुर से जुड़े लंबित मामलों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. कॉर्बेट के ढेला और कालागढ़ जैसे अत्यधिक निगरानी वाले क्षेत्रों में हुई मौतों की फॉरेंसिक रिपोर्ट तक पांच साल बाद पूरी नहीं हुई. जिन इलाकों को पर्यटन, प्रशासन और संरक्षण का प्रतीक बताया जाता है, वहां भी बाघों की मौत का सच दफन है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन 88 मामलों में आज तक कई जगह पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट, हिस्टोपैथोलॉजी रिपोर्ट और फोटो तक अधूरे हैं. यानी जिन बुनियादी दस्तावेजों से तय होना चाहिए था कि बाघ कैसे मरा, वे ही उपलब्ध नहीं हैं.

संरक्षण व्यवस्था केवल आंकड़ों का खेल

विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी देरी ने महत्वपूर्ण सबूत लगभग नष्ट कर दिए हैं. 2020 के फॉरेंसिक नमूने अब वैज्ञानिक रूप से कमजोर हो चुके होंगे. घटनास्थल बदल चुके होंगे. कानूनी श्रृंखला कमजोर पड़ चुकी होगी. और इसका सीधा मतलब है अगर मौत का कारण तय नहीं होगा, तो अपराध सिद्ध नहीं होगा. अपराध सिद्ध नहीं होगा, तो शिकारी नहीं पकड़े जाएंगे. और अगर शिकारी नहीं पकड़े जाएंगे, तो संरक्षण व्यवस्था केवल आंकड़ों का खेल बनकर रह जाएगी. सबसे विवादास्पद कदम NTCA का जनवरी 2026 का निर्देश है, जिसमें राज्यों को कहा गया कि 27 जनवरी तक लंबित रिपोर्टें जमा करें, अन्यथा मामलों को बंद कर दिया जाएगा. यानी हल नहीं किया जाएगा, सिर्फ बंद कर दिया जाएगा.

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वन्यजीव कार्यकर्ता इसे “डेटा लॉन्ड्रिंग” बता रहे हैं असहज सच को रिकॉर्ड से मिटाने की कोशिश.  आरटीआई कार्यकर्ता अजय दुबे ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह खात्मा नहीं है, सच को दफन करने जैसा है. आप शिकार, प्रशासनिक विफलता और जवाबदेही के सबूतों को राष्ट्रीय रिकॉर्ड से मिटा रहे हैं.”

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