नई दिल्ली:
विधानसभा चुनावों के हालिया नतीजों ने कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार चयन और उसकी चुनावी सफलता को लेकर नई बहस छेड़ दी है. असम, केरल, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को जहां भी जीत मिली, वह अधिकतर मुस्लिम‑बहुल सीटों और मुस्लिम उम्मीदवारों तक सीमित रही.
असम: 19 में 18 सीटें मुस्लिम उम्मीदवारों के खाते में
असम में कांग्रेस को कुल 19 सीटें मिलीं, जिनमें से 18 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार विजयी रहे. पार्टी ने यहां 20 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 18 जीते, जबकि 79 गैर‑मुस्लिम उम्मीदवारों में से केवल एक को सफलता मिली.
कांग्रेस की सहयोगी रायजोर दल को दो सीटें मिलीं. एक मुस्लिम उम्मीदवार के खाते में और दूसरी अखिल गोगोई के पास गई, जिन पर कथित माओवादी गतिविधियों से जुड़े मामले में NIA जांच चल रही है.
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केरल: UDF में मुस्लिम प्रतिनिधित्व की मजबूती
केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में 35 मुस्लिम विधायक चुने गए. इनमें से 30 कांग्रेस‑नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) से हैं. कांग्रेस के 8 मुस्लिम विधायक बने, जबकि उसकी सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं. इस राज्य में भी कांग्रेस गठबंधन की मजबूती मुख्यतः अल्पसंख्यक‑समर्थित क्षेत्रों में दिखी.
पश्चिम बंगाल: टिकट ज्यादा, सीटें सीमित
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को केवल दो सीटें मिलीं और दोनों मुस्लिम उम्मीदवारों ने मुस्लिम‑बहुल सीटों से जीत दर्ज की. दिलचस्प है कि कांग्रेस ने यहां 63 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जो सत्तारूढ़ टीएमसी (47) से भी ज्यादा थे. इसके बावजूद पार्टी व्यापक चुनावी सफलता हासिल नहीं कर सकी.
तमिलनाडु: सीमित उपस्थिति
तमिलनाडु में कांग्रेस ने दो मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से एक ने जीत दर्ज की. भले ही आंकड़ा छोटा हो, लेकिन यहां भी जीत उसी श्रेणी में सिमटी दिखी.
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80% से ज्यादा ‘स्ट्राइक रेट’
असम और केरल में कांग्रेस या कांग्रेस‑नेतृत्व वाले गठबंधनों के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत का स्ट्राइक रेट 80 प्रतिशत से ज्यादा रहा. इसके उलट, गैर‑मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन अपेक्षाकृत कमजोर रहा.
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि कांग्रेस की हालिया चुनावी सफलता सीमित सामाजिक‑चुनावी आधार पर केंद्रित रही है. यह पार्टी की मजबूत लेकिन संकुचित अल्पसंख्यक पकड़ की ओर इशारा करता है, साथ ही यह भी उजागर करता है कि पार्टी को अन्य वर्गों हिंदू, आदिवासी और ओबीसी मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है.
नतीजतन चुनावी नतीजे किसी एक समुदाय के ‘पक्के’ समर्थन का दावा नहीं करते, लेकिन यह जरूर बताते हैं कि कांग्रेस को व्यापक सामाजिक गठबंधन खड़ा करने के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा.


