High-rise building lifestyle: आजकल हर कोई चाहता है कि उसका आशियाना किसी ऊंची बिल्डिंग की 20वीं या 25वीं मंजिल पर हो, जहां से दुनिया छोटी नजर आए, लेकिन सोशल मीडिया पर अंजलि चौधरी नाम की एक महिला ने जो हकीकत बयां की है, उसे सुनकर आप भी अपनी बालकनी में खड़े होकर ठंडी आहें भरने लगेंगे. अंजलि का कहना है कि, ‘बाहर से दिखने वाली ये चमक धमक असल में एक ‘सुनहरा पिंजरा’ है, जहां इंसान सुविधाओं के बीच भी घुटकर रह जाता है. चार साल से एक ही छत के नीचे रहने के बाद भी उन्हें नहीं पता कि बगल वाले कमरे में कौन रहता है. यहां लोग लिफ्ट में मिलते तो हैं, पर नजरें मोबाइल में गड़ी होती हैं. न दुआ-सलाम, न हाल-चाल…बस मशीन की तरह आते-जाते लोग और सन्नाटे से भरी दीवारें.
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पड़ोसी नहीं, बस अनजान चेहरे (Stranger Neighbors in Luxury Societies)
अंजलि बताती हैं कि, जब वो यहां रहने आई थीं, तो बड़े चाव से आई थीं, पर अब ये जगह उन्हें किसी जेल से कम नहीं लगती. पुराने मोहल्लों का वो देसी अंदाज, जहां बिना बुलाए पड़ोसी चाय पर आ धमकते थे, अब इन हाई-राइज सोसायटियों में कहीं खो गया है. वहां सुख-दुख साझा करने वाले लोग थे और यहां सैकड़ों फ्लैटों के बीच भी रूह अकेली खड़ी है. यह अकेलापन सिर्फ एक महिला का नहीं, बल्कि आज के दौर की उस कड़वी सच्चाई का आइना है, जिसे हम ‘स्टेटस’ का नाम देते हैं. लोग प्राइवेसी के नाम पर अपनी ही दुनिया में ऐसे कैद हो गए हैं कि इंसानी जज्बात दम तोड़ रहे हैं.
याद आता है वो पुराना जमाना (Loneliness in luxury flats)
महिला के इस वीडियो ने इंटरनेट पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है. कोई कह रहा है कि प्राइवेसी अच्छी है, तो कोई पुराने मोहल्लों के उस भाईचारे के लिए तड़प रहा है, जहां खुशियां बांटने से बढ़ती थीं. सच तो यही है कि आलीशान घरों में सुकून तो मिल सकता है, पर वो अपनापन नहीं जो गली-नुक्कड़ की छोटी सी बातचीत में होता था.
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(डिस्क्लेमर: यह जानकारी सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर दी गई है. NDTV इसकी पुष्टि नहीं करता.)


