PM मोदी का WFH और पेट्रोल बचाने का मैसेज- क्या सरकार आने वाले गंभीर ऊर्जा संकट का संकेत दे रही है?

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होर्मुज स्ट्रेट में शिपिंग बाधाओं और वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव ने कच्चे तेल की कीमतों को लंबे समय तक ऊंचा बने रहने का संकेत दे दिया है. इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्क फ्रॉम होम, कार पूलिंग जैसे कदम को प्रोत्साहित करने की अपील की है. उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि देश को मौजूदा वैश्विक संकट से निपटने के लिए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल मीटिंग और पेट्रोल बचाने जैसे कदमों पर गंभीरता से लौटना होगा.

इसका मतलब ये है कि सरकार को पहले से ही आने वाले ऊर्जा संकट की आहट मिल चुकी थी और सभी तरीकों को आजमाने के बाद देश के मुखिया ने यह अपील की है. उन्होंने यह भी कहा कि पहले देश की जनता ने देश हित में अपना सोना, जेवर सरकार को दान दे दिया था, अभी सोना दान देने की जरूरत तो नहीं है पर अगले एक साल तक सोना न खरीदें. पीएम मोदी ने यह अपील आयात बिल का घटाने के उद्देश्य से की है.

ADB और अरामको का क्या है कहना?

एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने कहा है कि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं. उनका अनुमान है कि 2026 में औसत कीमत 96 डॉलर प्रति बैरल तक रह सकती है और 2027 में भी यह 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती है.

उधर सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासेर ने दुनिया को चेतावनी दी है कि पिछले दो महीनों में करीब 1 अरब बैरल तेल बाजार से गायब हो चुका है. उनका कहना है कि केवल सप्लाई रूट खोल देने से बाजार तुरंत सामान्य नहीं होगा क्योंकि कई सालों से तेल सेक्टर में कम निवेश ने संकट को और गहरा कर दिया है.

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भारत के जीडीपी में आ सकती है गिरावट

भारत के लिए यह खबर इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि देश अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. यानी दुनिया में तेल महंगा हुआ तो उसका सीधा असर भारतीय जेब पर पड़ेगा. पेट्रोल डीजल महंगे होंगे. ट्रांसपोर्ट महंगा होगा. खाने पीने की चीजों से लेकर हवाई टिकट तक सब कुछ प्रभावित हो सकता है.

एशियन डेवलपमेंट बैंक का अनुमान है कि इस संकट की वजह से भारत की GDP ग्रोथ में 0.6 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. साथ ही महंगाई भी बढ़ सकती है. ऐसे समय में प्रधानमंत्री मोदी का वर्क फ्रॉम होम वाला सुझाव केवल ट्रैफिक कम करने का अभियान नहीं बल्कि एक बड़े आर्थिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

दरअसल कोरोना काल के बाद भारत में ऑफिस कल्चर फिर तेजी से लौट आया था. बड़ी कंपनियां कर्मचारियों को वापस दफ्तर बुलाने लगी थीं. लेकिन अब जब तेल संकट गहराने की आशंका बढ़ रही है तो सरकार ऊर्जा बचत के पुराने फॉर्मूले पर लौटती दिख रही है.

भारत में प्रति दिन कितनी है खपत?

अगर देश के बड़े शहरों में हफ्ते में एक दिन भी वर्क फ्रॉम होम लागू होता है तो लाखों लीटर ईंधन की बचत हो सकती है. दिल्ली मुंबई बेंगलुरु हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में हर दिन करोड़ों रुपये का तेल ट्रैफिक में ही जल जाता है. प्राकृतिक गैस मंत्रालय के पेट्रोलियम प्लानिंग ऐंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर 2025 में भारत में प्रति दिन 1.01 मिलियन बैरल पेट्रोल और 1.72 मिलियन बैरल डीजल की प्रति दिन खपत है. 2024 के मुकाबले 2025 में पेट्रोल में 8% और डीजल में 6.7% का इजाफा देखा गया.

अब अगर इस साल पेट्रोलियम मंत्रालय के आंकड़ों को देखें तो अब तक भारत ने 10 लाख करोड़ रुपये के तेल आयात किए हैं. 2024-25 की इसी अवधि के दौरान भारत ने 11.66 लाख करोड़ रुपये के तेल आयात किए थे.

जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में भारत को केवल तेल आयात पर निर्भर रहने के बजाय इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और हाइब्रिड वर्क मॉडल पर ज्यादा जोर देना होगा. क्योंकि दुनिया का भू-राजनीतिक संकट अब सीधे आम आदमी की रसोई और जेब तक पहुंच चुका है.

दिलचस्प बात यह है कि 1970 के दशक के तेल संकट के बाद दुनिया भर में ऊर्जा बचत अभियान शुरू हुए थे. जापान ने उसी दौर में अपनी औद्योगिक क्षमताएं बढ़ाई थीं. यूरोप ने सार्वजनिक परिवहन यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट मजबूत किया गया था. अब भारत भी शायद उसी मोड़ पर खड़ा है जहां लाइफस्टाइल बदलना आर्थिक मजबूरी बन सकता है.

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सब्सिडी का भार

अगर तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब टिक गया तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भारी दबाव बन सकता है. सरकार टैक्स घटाकर राहत दे सकती है लेकिन इससे सरकारी खजाने पर भारी असर पड़ेगा क्योंकि बड़े पैमाने पर सब्सिडी पहले ही कई योजनाओं में दी जा रही है. यानी चुनौती दोहरी होगी. महंगाई संभालना भी और विकास की रफ्तार बनाए रखना भी.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री का वर्क फ्रॉम होम संदेश आने वाले समय की आर्थिक रणनीति जैसा नजर आने लगा है. जिसका मुख्य लक्ष्य पेट्रोल और डीजल की खपत को कम करते हुए वैश्विक ऊर्जा की कीमतों में हो रही बेतहाशा वृद्धि के दबाव को कम करते हुए आयात बिल को नियंत्रित करना है. ताकि इसका कम-से-कम असर आम आदमी तक पहुंचे. 

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