ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो क्या अमेरिका के सिर से हट जाएगा सुपरपावर का ताज? जानिए कारण

Latest and Breaking News on NDTV ईरान युद्ध लंबा खिंचा तो क्या अमेरिका के सिर से हट जाएगा सुपरपावर का ताज? जानिए कारण


अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब से ईरान पर इजरायल के साथ हमला किया है वो अलग-अलग तरह के बयान दे रहे हैं. कभी कहते हैं युद्ध जल्द खत्म होगा तो कभी और युद्धपोत खाड़ी में भेज दे रहे हैं. जाहिर है ईरान का युद्ध उनके हाथ से निकल चुका है. इससे साबित होता है कि अमेरिका अब तक निर्णय नहीं कर पा रहा है कि उसे जंग कब तक खिंचनी है या कब निकलना है. वहीं ईरान लगातार कह रहा है कि वो सालों तक अमेरिका-इजरायल से युद्ध करने के लिए तैयार है.

यूरोप को लालच दे रहा रूस 

इस बीच तेल और गैस की बढ़ती किल्लत के बीच रूस यूरोप को फिर से साधने में लगा है. यूरोप के कई देश रूस पर लगे सैंक्शन हटाने की मांग करने लगे हैं. रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने शुक्रवार को कहा कि रूसी ऊर्जा संसाधनों को अस्वीकार करते रहने से यूरोपीय राजनेता जानबूझकर अपने देशों को संकट और अंधकार में धकेल रहे हैं. मारिया जखारोवा ने अपने टेलीग्राम चैनल पर एक पोस्ट में कहा, “यूरोपीय संघ (ईयू) में वैश्विक संकट का कारण कोई तकनीकी आपदा या प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि इसके अपने नेताओं के फैसले हैं, जो बस स्थिति को बिगाड़ रहे हैं.” वहीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच, यूरोप में गंभीर ऊर्जा संकट की स्थिति में भी सदस्य देशों द्वारा रूसी प्राकृतिक गैस की खरीद पर स्पष्ट रोक लगाने वाले यूरोपीय संघ के अडिग रुख की पुष्टि की. मगर ये कब तक टिकेगा कहा नहीं जा सकता. इस महीने की शुरुआत में, हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने यूरोपीय संघ से रूसी ऊर्जा पर लगे प्रतिबंधों की समीक्षा करने और उन्हें निलंबित करने का आह्वान किया, और चेतावनी दी कि तेल की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति में व्यवधान क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा करते हैं.

अमेरिका का रूस से समझौता मजबूरी

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका पहले ही रूस को 30 दिनों के लिए राहत दे चुका है. अगर युद्ध लंबा चला तो रूस को और राहत देना अमेरिका की मजबूरी होगी. कारण ये है कि अमेरिका और इजरायल के अपनी जमीन और तेल-गैस संयंत्रों पर हमलों के जवाब में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की घेराबंदी कर रखी है. वो हमले भी तेल और गैस सप्लाई करने वाले खाड़ी देशों पर कर रहा है. निशाने पर खास तौर पर अमेरिका के सैन्य बेस हैं, लेकिन तेल और गैस संयंत्रों पर लगातार हमले कर रहा है. स्थिति ये है कि जो तेल और गैस जहाजों पर लदे हुए थे, वो होर्मुज बंद होने के कारण दुनिया में नहीं पहुंच पा रहे. वहीं तेल-गैस संयंत्रों पर हमले के कारण वहां काम भी ठप हो गया है. अगर ये जंग लंबी चलती है तो दुनिया में तेल और गैस की सप्लाई करना अकेले अमेरिका के बूते की बात नहीं रह जाएगी. मजबूरी में उसे रूस को तेल-गैस सप्लाई की इजाजत देनी ही पड़ेगी और अगर ऐसा हुआ तो साफ है कि अमेरिका और यूरोप को यूक्रेन की मदद से पीछे हटना पड़ेगा और यहीं से रूस का एक बार फिर से सोवियत रूस की तरह ताकतवर देश के रूप में उदय होगा.

चीन भी मौके की तलाश में

अमेरिका के लंबे समय तक जंग में फंसने का फायदा अकेले रूस ही नहीं उठाएगा, बल्कि चीन भी इसका लाभ उठाकर ताइवान पर कब्जे की कोशिश कर सकता है. वो इसके लिए लंबे समय से तैयारी कर रहा है. खुद पेंटागन मानता है कि चीन 2027 तक ताइवान को अपने कब्जे में लेने की तैयारी कर रहा है. इसी साल जनवरी के आसपास ईस्ट चाइना सी में हजारों जहाजों के साथ उसकी सैन्य तैयारी की सैटेलाइट इमेज ने दुनिया भर में सनसनी मचा दी थी. अब जब अमेरिका ईरान में फंसा रहेगा तो जाहिर है ताइवान की मदद के लिए वो नहीं आ पाएगा और चीन के लिए ऐसी ही स्थिति सबसे मुफीद रहेगी. चीन के ताइवान पर कब्जा करते ही ये साबित हो जाएगा कि अमेरिका और रूस ही नहीं बल्कि चीन भी जो चाहे वो कर सकता है, और उसे दुनिया में रोकने वाला कोई नहीं रहेगा.

Latest and Breaking News on NDTV

यूरोप नहीं रहेगा अमेरिका का पिछलग्गू

अमेरिका का सुपरपावर वाला रुतबा छीनने की एक और वजह ये भी रहेगी कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका ने नाटो बनाकर अपनी ताकत दुनिया में बढ़ा ली. 26 दिसंबर 1991 तक सोवियत रूस के टूटने तक रूस उसे चुनौती देता रहा, मगर अमेरिका नाटो देशों के जरिए रूस से लड़ता रहा. इस लड़ाई में सोवियत रूस आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो गया कि 15 देशों में बंट गया. उसके बाद से रूस के मन में हमेशा से सोवियत रूस वाली ताकत और इज्जत हासिल करने की इच्छा पनपती रही. अमेरिका में हुए 9/11 हमलों के दौरान जब तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने घोषणा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में या तो आप हमारे साथ हैं या हमारे खिलाफ तो रूस भी उसके सामने खड़ा नहीं हो सका. नाटो देशों ने अफगानिस्तान से लेकर इराक तक पर बम बरसाए और अपने उद्देश्यों की पूर्ति की. मगर ईरान युद्ध अलग दिख रहा है. अमेरिका के साथ सिर्फ इजरायल है. ट्रंप के लगातार अपील के बाद भी नाटो इस लड़ाई में शामिल होने को तैयार नहीं दिख रहा. जाहिर है, अब नाटो की मदद अमेरिका भी सोच-समझकर करेगा. यही कारण है कि ब्रिटेन-फ्रांस-जर्मनी-इटली-स्पेन जैसे देश अपनी सैन्य तैयारी कर रहे हैं. इससे अब तक अमेरिका के पीछे-पीछे चलने वाला यूरोप भी उसे आने वाले समय में चुनौती देगा. साफ है अमेरिका के लिए आने वाले समय में मनमानी करना मुश्किल हो जाएगा.  

ये भी पढ़ें-

इजरायल की ‘तीसरी आंख’ खरीदने की तैयारी, इसकी खासियत जान हो जाएंगे दंग

इजरायल का ऐलान-ईरान के नेताओं के सिर करेंगे कलम, और तेज होगा हमला

ईरान से युद्ध में अमेरिका की 3 हफ्तों में ही हो गई हालत खस्ता, 2003 के इराक युद्ध से हो गया ज्यादा खर्च

ईरान का दावा-तीसरा इजरायली लड़ाकू विमान गिरा दिया, जानिए अमेरिका के अब तक कितने मारे

अमेरिका-इजरायल ने ईरान के परमाणु संयंत्र पर किया हमला! IAEA ने शुरू की जांच

शत्रु मुसलमानों के बीच फूट डालना चाहता है… ईरान के राष्ट्रपति ने की ‘मिडिल ईस्ट की इस्लामी असेंबली’ ​​के गठन की अपील




Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *