नई दिल्ली:
सोचिए आपने सालों पहले क्रेडिट कार्ड से खर्च किया और हर महीने उसका बिल भरते रहे. अब जाकर पूरा बकाया क्लियर हो गया है. ऐसे में उम्मीद होती है कि अब खर्च का दबाव थोड़ा कम होगा. पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर देश में भी कुछ ऐसा ही माहौल है.
केंद्र सरकार लंबे समय से कहती रही कि कीमतें इसलिए कम नहीं की जा सकतीं क्योंकि पिछली सरकार के समय लिए गए ऑयल बॉन्ड का भारी कर्ज चुकाना पड़ रहा है. अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण साफ कर चुकी हैं कि यह कर्ज मार्च 2026 तक पूरी तरह खत्म हो चुका है.
The oil bonds issued under the Congress-led UPA, an abiding legacy of Sonia Gandhi and P. Chidambaram, have finally been put to rest.
A burden created to hide the real cost of fuel subsidies has now been fully paid off, bringing closure to yet another fiscal legacy left behind… https://t.co/26bzwC4t3o pic.twitter.com/cz4exxn21w
— Amit Malviya (@amitmalviya) March 14, 2026
ऐसे में आम आदमी के मन में सीधा सवाल है कि जब पुराना हिसाब बराबर हो गया, तो क्या अब पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा? आइए पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं.
यह भी पढ़ें- जंग आगे बढ़ी तो रसोई गैस सिलेंडर मिलेगा या नहीं? सप्लाई पर एक्शन प्लान तैयार, 10 दिन में सरकार के 10 बड़े फैसले
पहले समझते हैं कि क्या थे ऑयल बॉन्ड?
2005-2010 के बीच जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं, तब भारत सरकार के सामने भी ऑप्शन था कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए. लेकिन इसमें जोखिम यह था कि जनता नाराज हो जाएगी. तो सरकार ने बीच का रास्ता निकाला. और दामों को उतना ही रखा, जिससे तेल कंपनियां घाटे में जाने लगीं. इसके बाद ऑयल बॉन्ड का समाधान निकाला गया. सरकार ने तेल कंपनियों को कैश देने के बजाय ‘उधारी का कागज’ दिया. यानी ‘अभी घाटा सह लो, पैसे हम 15-20 साल बाद ब्याज के साथ देंगे.’
कितना बड़ा था ये बोझ?
The reality is that the economy today is far more transparent and robust than the so-called “rosy” period of the past, which was supported by off-budget accounting practices.
Under the leadership of the Hon’ble PM Shri @narendramodi Ji, we do not resort to such practices. Our… https://t.co/GRqQGu1GB1
— Nirmala Sitharaman Office (@nsitharamanoffc) March 17, 2026
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा में बताया कि यूपीए सरकार के समय (2004–2010) में सरकार ने बहुत बड़ा कर्ज लिया था, लेकिन उस समय ये पूरा कर्ज बजट में नहीं दिखाया गया. यानी कागजों पर असली स्थिति छुपी रही. अगर उस समय ये सारे कर्ज साफ-साफ बजट में दिखाए जाते, तो घाटा (Fiscal Deficit) ज्यादा दिखाई देता. अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत नहीं लगती जितनी बताई गई.
यह भी पढ़ें- क्रूड ऑयल सुनकर पेट्रोल-डीजल समझे क्या? देख लीजिए इससे बनने वाली चीजों की पूरी लिस्ट
क्या किया गया था?
सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर सब्सिडी देने के लिए सीधे पैसे देने के बजाय ‘ऑयल बॉन्ड’ जारी किए. 2004–05 से 2009–10 के बीच ₹1.48 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड दिए गए. इन पर 7% से 8.4% तक ब्याज देना पड़ा. लेकिन ये खर्च बजट में नहीं दिखाया गया. यानी कर्ज तो लिया, लेकिन उसे ‘ऑफ-बजट’ रख दिया.
इसका असर क्या हुआ?
उदाहरण के लिए 2008-09 में बताया गया कि घाटा GDP का 6.1% है. लेकिन अगर असली कर्ज जोड़ते, तो ये करीब 7.9% होता. इसी तरह:
- राजस्व घाटा 4.6% बताया गया.
- जबकि असल में ये 6.3% होता.
मतलब उस समय अर्थव्यवस्था की तस्वीर असल से ज्यादा अच्छी दिख रही थी.
अब क्या हो रहा है?
वित्त मंत्री के अनुसार, ‘2014 में नई सरकार को ₹1.34 लाख करोड़ का पुराना ऑयल बॉन्ड कर्ज मिला. इन पर ब्याज मिलाकर कुल भुगतान करीब ₹2.92 लाख करोड़ हुआ. मार्च 2026 तक ये पूरा कर्ज चुका दिया गया.’
इसका मतलब क्या है?
सरल शब्दों में समझें तो पहले का कर्ज आज चुकाना पड़ा. सरकार के मुताबिक अगर ये पैसा कर्ज चुकाने में न जाता, तो सड़कें बनतीं, अस्पताल बनते, स्कूल बनते. इसके विपरीत सरकार का दावा है कि अब बजट पूरी तरह पारदर्शी है. जो भी कर्ज है, वो खुलकर दिखाया जाता है. इसलिए आज के ग्रोथ के आंकड़े ज्यादा भरोसेमंद हैं.
यह भी पढ़ें- देश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं, लोग अफवाहों पर खरीदारी ना करेंः पेट्रोलियम मंत्रालय
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में क्या सिर्फ ऑयल बॉन्ड ही वजह थे?
यहीं कहानी थोड़ा बदलती है.
आंकड़े क्या कहते हैं: 2014 से 2023 के बीच पेट्रोल-डीजल पर ₹20–25 लाख करोड़ तक टैक्स वसूला गया.
पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी:
2014: ₹9.48/लीटर 2020: ₹32.98/लीटर (रिकॉर्ड स्तर)
2020-21 में ही एक्साइज से कमाई: करीब ₹3.7–3.8 लाख करोड़.
अब तुलना देखिए:
ऑयल बॉन्ड कर्ज: ₹1.5 लाख करोड़
टैक्स से कमाई: ₹20-25 लाख करोड़
सवाल उठता है कि क्या सिर्फ ₹1.5 लाख करोड़ के कर्ज की वजह से कीमतें ऊंची रहीं, जबकि कमाई उससे कई गुना ज्यादा थी?
अब दाम क्यों नहीं घटते?
पेट्रोल-डीजल की कीमत सिर्फ एक वजह से तय नहीं होती. इसमें कई फैक्टर काम करते हैं:
1. अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल
भारत 85% तेल आयात करता है. मौजूदा वक्त में इसकी कीमत $100+ प्रति बैरल के आसपास है.
2. डॉलर बनाम रुपया
फिलहाल डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर है और तेल की महंगा होना भी एक बड़ी वजह है.
3. टैक्स
कुल कीमत का 40-50% हिस्सा टैक्स होता है.
4. सरकार की कमाई
तेल सरकार के लिए ‘फिक्स रेवेन्यू’ का बड़ा जरिया है
अब आम आदमी के लिए क्या मतलब?
पुराना कर्ज खत्म हो गया है. यानी जो केंद्र सरकार इतने वर्षों से कह रही थी कि पुराने कर्ज को चुका रहे हैं, इसलिए फ्यूल के दाम कम नहीं किए जा सकते, उसका एक बड़ा तर्क खत्म हो गया है. ऐसे में सवाल है कि क्या अब ग्लोबल स्थिति सुधरने के बाद पेट्रोल-डीजल सस्ता हो जाएगा?
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
एक्सपर्ट्स की मानें तो बड़ी कटौती की संभावना बेहद कम है. अगर कच्चा तेल $70-75 प्रति बैरल तक गिरता है, तब कुछ राहत संभव है. लेकिन मौजूदा हालात (मिडिल ईस्ट तनाव, $100+ क्रूड) में कीमतें ऊंची रह सकती हैं. सीधी बात ये है कि पुराना कर्ज खत्म हुआ है, लेकिन राहत मिलना अभी बाकी है.


