नई दिल्ली:
मौसम विभाग का कहना है कि अगले तीन से चार दिनों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में आगे बढ़ने के लिए अनुकूल परिस्थितियां हैं. फिर भी, उत्तर भारत के लोगों के मन में ये सवाल बना हुआ है कि अगर मानसून आगे बढ़ रहा है, तो अभी तक बारिश क्यों नहीं हो रही है?
राजधानी दिल्ली और एनसीआर में भी मानसून की दस्तक अब महसूस होने लगी है. आसमान में लगातार बादलों की आवाजाही और सूरज की लुकाछिपी का दौर जारी है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के ताजा मौसम पूर्वानुमान के अनुसार आने वाले दिनों में एनसीआर के लोगों को गर्मी से कुछ राहत मिलने की संभावना है.
मानसून की बारिश को कम करने वाले सभी मुख्य कारण एक ही समय पर सक्रिय दिख रहे हैं, जिससे यह चिंता बढ़ गई है कि 2026 का दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत के कुछ हिस्सों में एक और हफ़्ते तक कमज़ोर या रुका हुआ रह सकता है.
4 जून को केरल में थोड़ी देरी से शुरू हुए मानसून ने तेज़ी पकड़ी और 15 जून तक दक्षिण, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत के ज़्यादातर हिस्सों में फैल गया, लेकिन उसके बाद इसकी रफ़्तार धीमी हो गई है.
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस सुस्ती की वजह भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल-नीनो (El Niño) की स्थिति का बनना, मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (Madden-Julian Oscillation) की कमज़ोर गतिविधि, उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में पश्चिमी हवाओं का सूखापन, कमज़ोर सोमाली जेट, बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले सिस्टम का न होना और न्यूट्रल इंडियन ओशन डाइपोल (Indian Ocean Dipole) की स्थिति है.
IMD के अनुसार, मॉनसून के आने की रेखा (onset line) हवा के पैटर्न में बदलाव, नमी की मौजूदगी और एक बड़े इलाके में लगातार बारिश के आधार पर तय होती है, न कि इस आधार पर कि हर ज़िले में एक साथ बारिश हो रही हो. नतीजतन, मॉनसून आधिकारिक तौर पर किसी राज्य में आगे बढ़ सकता है, भले ही कई शहरों में कई दिनों तक गर्मी और सूखा मौसम बना रहे.

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा सुस्ती मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी के ऊपर मज़बूत कम दबाव वाले सिस्टम के न होने की वजह से है. ये सिस्टम भारतीय मॉनसून के इंजन की तरह काम करते हैं, जो भारी मात्रा में नमी को ज़मीन की ओर खींचते हैं और मध्य व उत्तरी भारत में बारिश फैलाते हैं. इनके बिना, नमी वाली दक्षिण-पश्चिमी हवाएं कमज़ोर रहती हैं और बारिश छिटपुट होती है. हालांकि, ऐसे संकेत हैं कि स्थिति जल्द ही बदल सकती है.
मौसम के मॉडल बताते हैं कि पूर्वी हिंद महासागर में भूमध्य रेखा के उत्तर में एक बड़ा ट्रॉपिकल मौसम सिस्टम बन रहा है. अगले चार से सात दिनों में, इस सिस्टम के उत्तर की ओर बंगाल की खाड़ी में बढ़ने और मॉनसून की हवाओं को तेज़ करने की उम्मीद है. इसके आने से बंगाल की खाड़ी के ऊपर कम दबाव वाला क्षेत्र बन सकता है और संभवतः पश्चिमी भारत के ऊपर मध्य-ट्रोपोस्फेरिक भंवर भी बन सकता है.

ये दोनों मौसम प्रणालियां नमी के बहाव को बढ़ाने और देश के मध्य, पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में बारिश को काफी हद तक बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं. अगर ये स्थितियां पूर्वानुमान के अनुसार बनती हैं, तो जुलाई के पहले सप्ताह में बारिश की गतिविधि तेज़ होने की संभावना है, जिससे मॉनसून को दिल्ली-NCR सहित उत्तर-पश्चिम भारत के बाकी हिस्सों में तेज़ी से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी.
जब तक कम दबाव वाले मज़बूत सिस्टम नहीं बनते और नमी को इंडो-गैंगेटिक मैदानी इलाकों में गहराई तक नहीं पहुंचाते, तब तक उत्तर भारत के कई हिस्सों में गर्मी और उमस बनी रहने की संभावना है. यहां मॉनसून की व्यापक बारिश के बजाय कहीं-कहीं ही आंधी-तूफ़ान देखने को मिल सकते हैं.
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