IPS Lokesh Sonwal: सफलता की कहानियां अक्सर महलों में नहीं, बल्कि तंग गलियों और कठिन परिस्थितियों में जन्म लेती हैं. राजस्थान पुलिस सेवा (RPS) से होते हुए अपनी मेहनत और काबिलियत से आईपीएस (IPS) कैडर तक का सफर तय करने वाले एसपी लोकेश सोनवाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. सोनवाल जी ने हमें बताया कि उनका जीवन किसी फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं रहा है, जहां हर मोड़ पर एक नई चुनौती और उससे भी बड़ा साहस छिपा था. जयपुर शहर में पले बढ़े लोकेश सोनवाल युवाओं के लिए एक रोल मॉडल के रूप में पहचान हैं.
गरीबी और संघर्ष के शुरुआती दिन
सोनवाल जी ने साझा किया कि उनका बचपन जयपुर शहर के परकोटे (चारदीवारी) के पीछे, सोफिया स्कूल के पास स्थित एक ऐसी बस्ती में बीता, जिसे स्थानीय लोग ‘कचरा बस्ती’ कहते थे. उनके पिता एक साधारण परिवार से थे और पांच भाइयों के बड़े परिवार को पालने के लिए उन्हें बेहद कम वेतन मिलता था. सोनवाल जी ने याद करते हुए बताया कि वे झोपड़ी में रहते थे, जहां बुनियादी सुविधाओं का अभाव था. यहां हर जुम्मे के दिन कुश्ती दंगल होता था। साथ ही यहां मुर्ग़ा लड़ाई, प्रतिदिन कबूतर बाज़ी और छोटी छोटी बातों पर चाकूबाजी आम बात थी.
12 साल की छोटी उम्र से ही उन्होंने नगीने घिसने का काम शुरू कर दिया था. उस दौर में जयपुर के उस मोहल्ले का माहौल काफी अलग था-कुश्ती, दंगल, और नगीने घिसने की खटखट. सोनवाल जी ने बताया कि उन्होंने न केवल नगीने घिसे, बल्कि परिवार की मदद के लिए बचपन में पंखियां तक बेचीं. आढ़त का काम हो या मेहनत-मजदूरी, उन्होंने कभी काम को छोटा नहीं समझा.
खेल से प्रशासन तक का सफर
सोनवाल जी न केवल मेहनती छात्र थे, बल्कि बचपन से ही खेल के प्रति भी समर्पित थे. वे जयपुर शहर में क्रिकेट खेलते थे और बाद में आरसीए (RCA) की महत्वपूर्ण कमेटियों में भी रहे. RCA में प्रबंधन के साथ जुड़े रहने के दौरान राजस्थान पहली बार 2011 और दूसरी बार 2012 में रणजी ट्रॉफ़ी चैंपियन रही, जिसे वे अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानते हैं. उन्होंने मात्र 17-18 वर्ष की आयु में स्टेनोग्राफी और टाइपिंग सीख ली थी और 19 साल की उम्र से ही उन्होंने सरकारी नौकरी का सफर शुरू कर दिया था. उन्होंने मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत के कार्यालय में भी काम किया.
प्रशासनिक जीवन और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति
सोनवाल जी ने बताया कि पुलिस सेवा में आने के बाद उनका एक ही ध्येय रहा- जनता से जुड़ाव. वे जब दौसा में एडिशनल एसपी (हेडक्वार्टर) थे, तब उन्होंने वहां की जनता के साथ एक गहरा संबंध स्थापित किया. वे फरियादियों को सुनने के लिए खुद घंटों बैठते थे और उनका यह मानना था कि पुलिस को फरियादी के लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए.
प्रदेश के बड़े-बड़े रेस्क्यू में अहम भूमिका
दौसा में अपनी पदस्थापना के दौरान, उन्होंने अपने SDRF में पदस्थापन के लंबे अनुभव के साथ SDRF के साथ के साथ मिलकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन का नेतृत्व किया. इस दौरान उन्होंने एक बोरवेल में फंसी बच्ची को सुरक्षित बाहर निकाला. इतना ही नहीं, इन्होंने जालौर के रायफल गांव में जान जोखिम में डालकर बिपरजॉय तूफ़ान के समय 62 लोगों को सुरक्षित बचाया, जिसमें बच्चे और महिला अधिक थी. यह प्रदेश का सबसे बड़ा सफल बचाव अभियान था, जिसके लिए सीएम और अधिकारियों ने एसपी सोनवाल की तारीफ की थी और पत्र दिए थे. इसके बाद उन्होंने बताया कि उस कठिन समय में वरिष्ठ अफसरों का नेतृत्व मिला, जिससे उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला.
जयपुर परकोटे की बड़ी घटना
सोनवाल जी के करियर का एक सबसे चर्चित अध्याय जयपुर नगर निगम में कमिश्नर (विजिलेंस) के रूप में रहा. जयपुर की सड़कों और ऐतिहासिक विरासत को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए एक साहसी और निर्णायक अभियान चलाया था. अभियान के दौरान बड़ी चौपड़ से लेकर छोटी चौपड़ तक सड़क के किनारे स्थित 16 मंदिरों पर विशेष ध्यान दिया गया. इन मंदिरों की वास्तुकला की सुंदरता बढ़ाने वाले ‘गोखे’ (प्रवेश द्वार के दोनों ओर बने स्थापत्य) पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया था. सोनवाल जी ने स्पष्ट किया कि ये मंदिर देवस्थान विभाग के अंतर्गत थे और वे गोखे सरकारी भूमि का हिस्सा थे. उन्होंने बिना किसी भेदभाव के इन 16 गोखों को ध्वस्त किया और वहां से अतिक्रमण को पूरी तरह हटा दिया.
उनके इस अभियान का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा बड़ी चौपड़ पर हवा महल के समीप स्थित 44 दुकानों को हटाना था. चूड़ियों की ये दुकानें पिछले 70-75 वर्षों से मुख्य मार्ग पर कब्जा जमाए बैठी थीं. सोनवाल जी ने बताया कि उन्होंने दुकानदारों को कई बार समझाइश दी और अनुनय-विनय की, लेकिन जब वे नहीं माने, तो वर्ष 2011 में उन्होंने बुलडोजर का इस्तेमाल कर इन अवैध ढांचों को ध्वस्त कर दिया. इस दौरान इनके ऊपर बहुत राजनीतिक दबाब भी आया था, लेकिन आईपीएस सोनवाल वहां रुके नहीं.
चुनौतियों के बीच अडिग रहने का साहस
सोनवाल जी ने बताया कि जब उन्होंने करौली में पदभार संभाला, तो वहां का माहौल काफी चुनौतीपूर्ण था. वहां अपराध का एक ऐसा जाल बिछा हुआ था, जो वर्षों से जड़ों में समाया हुआ था. चाहे वह सटोरियों का नेटवर्क हो या 2022 के दंगों के मास्टरमाइंड अमीनउद्दीन की गिरफ्तारी, सोनवाल जी ने कानून के सामने किसी को नहीं बख्शा. उन्होंने बताया कि जब पत्रावली में साक्ष्य पूरे हों, तो केवल साहस की आवश्यकता होती है. कई बार राजनीतिक और अन्य दबाव आए, लेकिन उन्होंने अपने कर्तव्य के मार्ग से कभी समझौता नहीं किया. इस कार्रवाई में 600 से अधिक पुराने अपराधियों की धरपकड़ जो करीब एक साल से लेकर 30-40 सालों से फ़रार जघन्य अपराधी, जिसमें हत्यारे बलात्कारी और 420 डकैत भी शामिल थे.
एसपी लोकेश सोनवाल का संदेश साफ है संघर्ष कितना भी बड़ा हो, यदि आपका इरादा जनता की सेवा का है और आप कानून के दायरे में रहकर कार्य कर रहे हैं, तो सफलता निश्चित रूप से आपके कदम चूमती है. आज करौली में उनकी उपस्थिति एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी की है, जिस पर आम जनता अटूट विश्वास करती है.
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