मिडिल ईस्ट की टेंशन की वजह से कच्चे तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गई हैं. नतीजन कई देशों की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा है. भारत देश इससे अछूता नहीं रहा. इसी बीच देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए रिजर्व बैंक ने कई बड़े फैसले लिए हैं. विदेशी निवेशक वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय मार्केट से लगभग 13.7 अरब डॉलर का पैसा निकाल चुके हैं. ऐसे में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने देश में डॉलर को बढ़ाने के लिए 5 बड़े कदम उठाए हैं.
1. विदेशी निवेशकों के लिए नियम किए आसान
आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए 15, 30 और 40 साल के लॉन्ग पीरियड वाले सरकारी बॉन्ड्स को फुली एक्सेसिबल कर दिया है. इसके अलावा शॉर्ट टर्म इन्वेस्टमेंट पर लगी पुरानी पाबंदियां भी हटा दी गईं हैं. टैक्स छूट के साथ मिलकर ये कदम भारती बॉन्ड मार्केट को ग्लोबल मार्केट में सबसे आगे लेकर आ सकता है.
2. सरकार ने कैपिटल गेन पर से हटाया टैक्स
विदेशी निवेश का फ्लो बढ़ाने के लिए सरकार रिजर्व बैंक के साथ मिलकर काम कर रही है. सरकार ने विदेशी संस्थापक निवेशक के लिए सरकारी बॉन्ड पर कैपिटल गेन्स टैक्स के मामले में छूट दे दी गई है. दरअसल सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों को ब्याज और कैपिटल गेन्स पर अब कोई टैक्स नहीं देना होगा, इस नियम को 1 अप्रैल 2026 से लागी किया गया है.
3. सरकारी कंपनियों के लिए सस्ता विदेशी कर्ज
पब्लिक सेक्टक की कंपनियों को विदेशी बाजारों से कमर्शियल लोन लेने के लिए आरबीआई 30 सितंबर 2026 तक सस्ता फॉरेक्स स्वैप की सुविधा देगा. इससे कंपनियों के लिए विदेशी लोन की हेजिंग कॉस्ट काफी कम हो जाएगी.
4. एनआरआई डिपॉजिट्स पर रिजर्व बैंक खुद उठाएगा खर्च
विदेशी करेंसी के फ्लो को बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक ने बैंकों को बड़ी राहत दी है. दरअसल अगर बैंक 3 से 5 साल के पीरियड के लिए नए एनआरआई डिपॉजिट्स जुटाते हैं, तो उनकी पूरी हेजिंग कॉस्ट खुद रिजर्व बैंक सहन करेगा. ये स्कीम भी 30 सितंबर 2026 तक लागू रहेगी.
5. निर्यातकों को मिला समय
मिडिल ईस्ट क्राइसिस के चलते ग्लोबल मार्केट में मालभाड़े और बीमा की कॉस्ट में इजाफा हो गया है. अब आरबीआई ने भारतीय निर्यातकों को राहत देते हुए एक्सपोर्ट से होने वाली कमाई को भारत वापस लाने की समयसीमा को फिर से बढ़ाकर 9 महीने कर दिया है.
क्यों इन 5 बड़े फैसलों की जरूरत पड़ी?
भले ही भारत के पास 29 मई 2026 तक 682.3 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार, जो 11 महीने के इंपोर्ट के लिए काफी है, मौजूद है, लेकिन कच्चे तेल के दाम 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से आरबीआई कोई रिस्क नहीं लेना चाहता. एक्सपर्ट ने बताया कि इन बड़े फैसलों के जरिए देश ग्लोबल मार्केट में चल रही उभरते बाजारों की रेस में सबसे आगे निकल सकता है. साथ ही इससे देश में डॉलर का इनफ्लो भी तेजी से बढ़ेगा.


