57 साल पुराने तारापुर पावर प्लांट को मिला नया जीवन, दोनों परमाणु रिएक्टरों को फिर से किया गया चालू

Tarapur Nuclear Plant 57 साल पुराने तारापुर पावर प्लांट को मिला नया जीवन, दोनों परमाणु रिएक्टरों को फिर से किया गया चालू


भारत ने न्यूक्लियर साइंस के क्षेत्र में एक बड़ा काम किया है. महाराष्ट्र के तट पर मौजूद तारापुर परमाणु बिजली घर के दो पुराने रिएक्टर आज भी ठीक से काम कर रहे हैं. ये रिएक्टर पिछले 57 सालों से देश को बिजली दे रहे हैं. ये दुनिया के सबसे पुराने परमाणु रिएक्टर हैं जो अब भी चल रहे हैं. इन रिएक्टरों को इतने सालों तक सेफ रखना आसान नहीं रहा. भारतीय इंजीनियरों ने इनमें बड़ी और मुश्किल मरम्मत की. इस काम को ओपन हार्ट सर्जरी जैसा कहा गया, क्योंकि ये बहुत ही नाज़ुक और कठिनाई से भरा हुआ था. इस मरम्मत की वजह से ये पुराने रिएक्टर फिर से अच्छी तरह काम करने लगे. यानी जो काम नामुमकिन लगता था, भारत के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उसे कर दिखाया.

NDTV की टीम को परमाणु रिएक्टरों के अंदर जाने की अनुमति मिली. इस दौरान टीम के साथ न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर बी.सी. पाठक भी थे. वहाँ जाकर हमने जाना कि भारत ने ऐसा काम कैसे किया, जिसे खुद परमाणु इंजीनियर दिल की ओपन‑हार्ट सर्जरी जैसा मुश्किल मानते हैं.

Tarapur Nuclear Plant

इंजीनियरिंग का जादू

न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) के चेयरमैन और एमडी बी.सी. पाठक ने इसे ओपन हार्ट सर्जरी का नाम दिया है. उन्होंने बताया कि रिएक्टर का दिल यानी प्रेशर वेसल अभी भी पूरी तरह सेफ और मजबूत था, लेकिन उसके चारों ओर की नस यानी पाइपलाइनें पुरानी हो चुकी थीं. NPCIL के इंजीनियरों ने रेडिएशन की चिंता किए बिना दिन-रात काम करते हुए 24-इंच की स्टेनलेस स्टील पाइपलाइनों को बदल दिया. सबसे बड़ी बात ये है कि ये पूरा काम बाहर की किसी कंपनी को सौंपने के बजाय अपने देश की तकनीक और बिना किसी मदद के खुद के बल पर किया.

1969 में जब तारापुर की यूनिट 1 और 2 शुरू हुई थीं, तब परमाणु तकनीक शुरुआती दौर में थी. लेकिन आज इन रिएक्टरों में फुकुशिमा हादसे के बाद बनाए गए कंटेनमेंट फिल्टर्ड वेंटिंग सिस्टम जैसे कमाल के सेफ्टी फीचर जोड़े गए. बी.सी. पाठक के अनुसार “आज ये 57 साल पुराना रिएक्टर किसी नए रिएक्टर जितना ही सेफ और मॉडर्न है.”

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हजारों करोड़ की बचत

अगर भारत इन दो पुराने रिएक्टरों की जगह नए प्लांट लगाता, तो उस पर हजारों-करोड़ रुपये का खर्च आता. लेकिन केवल 400 करोड़ रुपये के खर्चे से इन दोनों यूनिट्स को फिर से शुरू कर दिया गया. ये देश की आर्थिक रूप से एक बड़ी जीत है. 1974 के पोखरण टेस्ट के बाद जब दुनिया ने भारत को फ्यूल और तकनीक देने से मना कर दिया था, तब तारापुर ने ही बताया कि आत्मनिर्भरता क्या होती है. आज यहां फ्यूल की कोई कमी नहीं है.

Tarapur Nuclear Plant

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भविष्य की सोच

तारापुर आज एक अनोखा केंद्र बन गया है. एक तरफ यहां दुनिया का सबसे पुराना चालू रिएक्टर है, तो दूसरी तरफ भारत यहां ‘भारत स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर’ (BSMR) जैसी भविष्य की तकनीक बनाने की तैयारी कर रहा है. कंट्रोल रूम में आज भी एनालॉग डायल और गेज मौजूद हैं, जिन्हें देखकर इतिहास की याद आ आती है.

बी.सी. पाठक ने बताया कि हम 160‑160 मेगावाट साफ बिजली बना रहे हैं. तारापुर का कंट्रोल रूम आज की तरह डिजिटल नहीं, बल्कि एनालॉग है यानी मीटर, डायल और स्विच वाले. उस समय यही तकनीक थी. फिर भी कंट्रोल रूम बिल्कुल नया और अच्छा दिखता है. यहां युवा इंजीनियर, जिनमें महिला अधिकारी भी शामिल हैं, रिएक्टर संभाल रही हैं.

650 सालों का अनुभव

बी.सी. पाठक के अनुसार, भारत के सभी परमाणु रिएक्टरों को मिलकर अब तक 650 साल का काम करने का अनुभव है. रेडिएशन का स्तर कभी भी तय सीमा से बाहर नहीं गया. 1969 से अब तक कोई भी बड़ा हादसा नहीं हुआ है.

तारापुर की ये सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि ये भारतीय वैज्ञानिकों के उस जज्बे का सबूत है जिसने टेक्नोलॉजी डिनायल के दौर में भी हार नहीं मानी. 57 साल बाद भी तारापुर का दिल धड़क रहा है. 

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