वेंटिलेटर पर सांसें और बैंक में पैसा दोनों अटकीं, क्या आम आदमी के लिए फांस बन गए बैंकिंग नियम?

वेंटिलेटर पर सांसें और बैंक में पैसा दोनों अटकीं, क्या आम आदमी के लिए फांस बन गए बैंकिंग नियम? वेंटिलेटर पर सांसें और बैंक में पैसा दोनों अटकीं, क्या आम आदमी के लिए फांस बन गए बैंकिंग नियम?

इंसान अपनी पूरी उम्र की पूरी कमाई बैंक के पास इसलिए रखता है, जिससे मुसीबत के समय वो काम आ सके. लेकिन क्या होगा जब वो मुसीबत आ गई हो बैंक पैसे देने से मना कर रहा हो क्योंकि मरीज खुद चलकर बैंक नहीं आ सकता. दरअसल सोशल मीडिया पर ऐसा ही मामला सामने आया है. एक शख्स के मामाजी, जो इस वक्त अस्पताल में वेंटिलेटर पर मौत से जूझ रहे हैं, उनकी सारी जमापूंजी एक सरकारी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में जमा है. जब परिवार को इलाज के लिए पैसों की जरूरत पड़ी, तो पता चला कि बैंक ने खाता सील्ड कर दिया. बैंक का कहना है कि मरीज ने आकर री-केवाईसी (Re-KYC) नहीं कराया है.

‘वो वेंटिलेटर पर हैं, बैंक कैसे आएं?’

मरीज के परिजन बैंक से गुहार लगा रहे हैं कि उनका मरीज वेंटिलेटर पर है, वो खुद बैंक नहीं आ सकता, इसलिए मानवीय आधार पर मदद की जाए. लेकिन बैंक ने साफ कहा कि अगर मरीज खुद आकर पहचान नहीं देगा, तो खाता नहीं खुलेगा. ये स्थिति बहुत अजीब और चिंताजनक है. एक तरफ हम डिजिटल इंडिया और आसान बैंकिंग की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ मरीज से भी बैंक आने की शर्त रखना बहुत कठोर लगता है.

क्या कहते हैं आरबीआई के नियम?

आरबीआई के नियमों के अनुसार बैंक में केवाईसी जरूरी है, लेकिन जो लोग गंभीर रूप से बीमार हैं या बिस्तर पर हैं, उनके लिए बैंक अपने नियमों में ढील दे सकता है. ऐसे मामलों में बैंक डोरस्टेप बैंकिंग या किसी और आसान तरीके से जांच कर सकते हैं.

सीधी बात ये है कि अगर जरूरत के समय अपनी ही कमाई काम ना आए, तो उसका कोई मतलब नहीं रह जाता. ये सिर्फ एक परिवार की समस्या नहीं है, बल्कि देश के लाखों बुजुर्गों और बीमार लोगों की परेशानी है. अब समय आ गया है कि बैंकिंग सिस्टम में सिर्फ तकनीक ही नहीं, बल्कि इंसानियत और समझ भी शामिल हो.

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