AI ने कॉमनवेल्थ फाउंडेशन पुरस्कार तो जीत लिया लेकिन इंसानों को नहीं हरा सकता

AI ने कॉमनवेल्थ फाउंडेशन पुरस्कार तो जीत लिया लेकिन इंसानों को नहीं हरा सकता AI ने कॉमनवेल्थ फाउंडेशन पुरस्कार तो जीत लिया लेकिन इंसानों को नहीं हरा सकता

आज हम आर्टिफिशल इंटेलिजंस (एआई) के दौर में हैं. इस युग के शुरुआत में बहुत तरह की जिज्ञासा, भ्रांतियां और डर मिश्रित शंका का माहौल बन रहा था. हर नई खोज अपने साथ बहुत सारी सुविधाएं और नए अवसर लेकर आती है. इतने बदलाव के साथ बहुत कुछ हासिल करने के क्रम में इंसान को उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है.’एआई’ के शुरुआती समय में आमजन के मन में यह मानसिकता जगह बना रही थी कि यह बदलाव युवाओं का रोजगार छीन सकता है. बात सिर्फ यहीं तक नहीं रूकी. वर्तमान में प्रोफेशनल्स अपने ऑफिस के महत्वपूर्ण कार्यों और प्रेजेंटेशन के लिए यहां तक कि इमारतें बनवाने के लिए इंजीनियर्स भी AI पर निर्भर रहने लगे हैं. अब हर छोटे-बड़े काम में एआई की मदद ली जा रही है. 

अलग-अलग क्षेत्रों के साथ लेखन पर भी इसका प्रभाव पड़ना ही था. लेखन, खास तौर पर हिन्दी लेखन हमेशा से चुनौतियों का सामना करता रहा है. यह बहुत अधिक अध्ययन और जीवन अनुभव की मांग करता है. यही कारण रहा कि आरंभिक काल में कलमकार को रोजगार की परेशानी झेलनी पड़ी.जो ‘फुल टाइम लेखन’ का चुनाव करना चाहते थे यानी सरस्वती के प्रति समर्पित रहना चाहते थे, उन्हें जीवन-यापन के लिए लक्ष्मीपुत्रों के दरबार में हाजिरी लगानी पड़ी.प्रेमचंद और उस समय के लेखकों का हाल भी किसी से छिपा नहीं है.आज का लेखक इस मामले में कुछ समझदार हो गया है. वह जीविकोपार्जन के इंतजाम करने के साथ/बाद कलम उठाता है. इसका मतलब उसके लिए चुनौतियां समाप्त हो गई हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. आज के दौर की अन्य चुनौतियों के साथ ‘एआई’ रचनात्मकता पर भी असर डाल रहा है.

कॉमनवेल्थ फाउंडेशन हर साल अंग्रेजी भाषा की एक और रीजनल भाषाओं की पांच शॉर्ट स्टोरी को पुरस्कृत करता है.पुरस्कृत कहानियां ब्रिटिश साहित्यिक पत्रिका ‘ग्रांटा’ में प्रकाशित होती हैं. इस पुरस्कार के तहत चयनित रीजनल कहानियों को 2500 ब्रिटिश पाउंड और ओवर ऑल विनर को 5000 ब्रिटिश पाउंड की पुरस्कार राशि दी जाती है. जहां सम्मान राशि बड़ी होती है, उस ज्यूरी की जिम्मेदारी भी बड़ी हो जाती है. इसके बावजूद 2026 के लिए चयनित तीन रीजनल कहानियों पर ‘एआई’ द्वारा लिखवाए जाने के आरोप लग रहे हैं.

लेखन की मौलिकता क्या है

इसके बारे में अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर पढ़ते हुए मुझे याद आया कि कुछ समय पूर्व हिन्दी के एक बड़े प्रकाशक से बात हो रही थी. उन्होंने बताया था,”लेखन की मौलिकता जांचने में कठिनाई आ रही है.” उन्होंने बताया कि उनके प्रकाशन ने लेखन की मौलिकता जांचने के लिए महंगी मशीनरी पर इन्वेस्ट किया है. ये मशीनरी एआई और मौलिक लेखन में अंतर बता सकेगी. करीब आठ-दस महीने बाद जब इसी प्रकाशक से दोबारा बात हुई तो उन्होंने बताया,”आज के दौर में एआई को इग्नोर करना बहुत मुश्किल है.स्थापित से लेकर बहुचर्चित लेखक भी निसंकोच एआई की मदद से लेखन कर रहे हैं. ऐसे समय में नए लेखकों से क्या उम्मीद की जा सकती है.” प्रकाशक की बात से मैं मन ही मन इसीलिए भी सहमत थी कि ऐसा ही कुछ अनुभव मेरा भी है. एक दिन खुद को लेखक कहने वाले एक ‘लेखक’ समय लेकर घर मिलने आए. बातचीत के दौरान वह ‘मुद्दे’ पर आ गए. उन्होंने कहा कि आपकी फलां पुस्तक अभी हिन्दी के फलां बड़े प्रकाशक से आई है. कृपया आप प्रकाशक से मेरी मुलाकात करवा दीजिए, मैं इस विषय (उन्होंने एक महत्वपूर्ण टॉपिक बताया) पर पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहता हूं. मेरे पूछने पर कि क्या आपने पुस्तक पर काम पूरा कर लिया है? लेखक महोदय ने बड़ी सादगी और बड़ा अधिकारी होने के रुआब के साथ कहा,”अगले सप्ताह तक पुस्तक तैयार हो जाएगी. मैंने पीए को बता दिया है, वो एआई को निर्देश दे कर पुस्तक तैयार कर देगा. आजकल तो चुटकी बजाते ही किताब तैयार हो जाती है.” उन्होंने चुटकी बजाते हुए कहा.

मेरे टोकने और सही राह दिखाने का प्रयास करने पर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,”वन्दना जी आजकल खुद कौन लिखता है? एआई हमारी सुविधा के लिए है. सुविधा का फायदा उठाना चाहिए.” ऐसे में मैं क्या ही कहती. उपन्यास की तैयारी में, रिसर्च में, लिखते समय व्यक्तिगत अनुभवों, उपन्यास की जमीन से जुड़े फैक्ट्स पर काम करने वाले लेखकों की जब इस तरह की वक्ती आंधियों से मुलाकात हो जाए तो क्या वह अपने मकान इनके हवाले कर देंगे?

समझदारी से करें एआई का प्रयोग

बात यहीं खत्म नहीं होती. सच्चाई यह है कि ‘एआई’ का प्रयोग जहां मानवीय सहायता के लिए किया जाना चाहिए वहीं कुछ मासूम/चालाक लोग इसका बेजा प्रयोग भी कर रहे हैं. बंदूक के समान यह सुरक्षा का साधन हो सकता है मगर यही अपराधियों के हाथ में औजार का काम भी करेगा. इन सबके बावजूद हम ना तो नई खोज को दरकिनार कर सकते हैं और ना ही इससे दूरी बना सकते हैं. हमें इसका उपयोग समझदारी से करना होगा. याद कीजिए वह समय जब हम सब को 15-20 फोन नंबर मुंह जुबानी याद रहते थे. मोबाइल ने हमारी यादाश्त पर प्रहार किया है. अब एक-दो नंबर याद रखना भी मुश्किल होता जा रहा है. पहले पहाड़े याद होते थे. बड़े से बड़ा हिसाब चुटकियों में हल हो जाता था. कैलकुलेटर ने हमें आसानी तो दी मगर गणित में हमारी मानसिक आत्मनिर्भरता छीन ली.यह सोचने-समझने का समय है कि कहीं जरूरत से ज्यादा निर्भरता हमारी रचनात्मकता का हनन ना कर ले, हमारा आत्मविश्वास ना छीन ले. हमें यह याद रखना होगा कि इंसानी दिमाग आविष्कार करता है.’एआई’ हमारा आविष्कार है. यह हमारी सहायता का बायस बने, हमारे दिमाग पर कब्जा करके, इंसानी सोच-समझ को कुंठित ना कर दे.

समझने लायक एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ‘एआई’ के पास अपना कुछ भी नहीं है. वह हमारे फीड किए हुए डेटा से ज्ञान संचित कर रहा है. इससे अलग जो जानकारी पहले से गूगल पर है, एआई उसका प्रयोग भी कर रहा है. चिंता की बात यह है कि क्या गूगल पर उपलब्ध सारी जानकारी सही है? मैं सौ फीसदी विश्वास के साथ कह रही हूं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है. जब ‘एआई’ की जानकारी के सोर्स पर संदेह है तब उसके उत्पाद पर निर्भरता भी संदेह में आ जाती है. इसके प्रयोग से संभवत: भाषा का परिष्कृत रूप मिल जाए मगर एआई द्वारा रचित कथा-कहानी, उपन्यास में जीवन अनुभव और जीवंतता का प्रतिशत कितना सही होगा, यह हमेशा संदेह में रहेगा.

माना जा रहा है कि ‘एआई’ कमाल का लेखन कर रहा है. संभव है कि ऐसा एक हद तक सही भी हो. इन दिनों अमेरिकी टीवी इंडस्ट्री द्वारा निर्मित ‘द कम बैक’ शो चर्चा में है. इस नए सीजन का लेखक तथाकथित रूप से ‘एआई’ है. यही इसका प्लॉट पॉइंट है. इसके एक सीन में जब डायरेक्टर ‘एआई’ से कोई जोक यानी चुटकुला देने की मांग करता है, वह पलक झपकने से पहले ही 15 चुटकुले हाजिर कर देता है. सह-लेखक जो इंसान है, वह इन जोक्स को पढ़कर हैरान रह जाता है. पहला चुटकुला थोड़ी-सी देर पहले उसने ही स्क्रिप्ट में जोड़ा था. दूसरा एक बड़े लेखक का दिया हुआ चुटकुला था. इसका मतलब यह हुआ कि यह आपकी रचनात्मकता से मौलिकता चुरा रहा है. महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि लेखक के नाम के बिना उसकी किसी भी तरह की सामग्री का प्रयोग ‘अपराध’ की श्रेणी में आता है.

लेखक और उसकी लेखन शैली

एआई संभवत: चुटकियों में हर तरह की सामग्री उपलब्ध करवा सकता है. वह दुनिया की तमाम भाषाओं के ज्ञान का अनुवाद आपके सामने पेश कर सकता है. यह सिक्के का एक पक्ष है मगर ‘एआई’ के पास सिर्फ तकनीक है. यहां याद रखने की बात यह है कि ‘एआई’ आपको पहले से मौजूद सामग्री का कोई खास अंश उपलब्ध करवा रहा है. उसका निजी कुछ भी नहीं है. उसके पास अनुभव नहीं है, भावनाएं भी नहीं हैं. इससे इतर साधारण लेखक को महान रचनाकार बनाने में उसका अध्ययन, लेखकीय अनुभव, मौलिक विचार, जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव और इंसानी भावनाएं अहम टूल का काम करती हैं. लेखक की कल्पनाशीलता, उसका अनुभव संसार उसके काम में दिखाई देता है. प्रत्येक लेखक के ‘कहन’ में एक अलग तरह का सौंधापन उसे अलग पहचान देता है. हम बिना नाम देखे प्रेमचंद, अज्ञेय, महादेवी वर्मा आदि के लेखन को पहचान लेते हैं. यही मौलिकता लेखक की यूएसपी है. लेखक के खास तरह के ‘कहन’ के कारण पाठक उससे जुड़ते हैं. 

कहीं किसी पुस्तक में पढ़ा एक किस्सा याद आ रहा है, एक दिन एक युवा कलमकार ने घर लौटकर अपनी बहन को कागज का एक पुलिंदा सौंपते हुए कहा,”यह मेरा नया उपन्यास है.पढ़कर बताओ कि कैसा है.” बहन ने उस कृति को पढ़ कर कहा,”यह तो शिवानी का उपन्यास लग रहा है.” युवा कलमकार ने बताया कि वह रेलगाड़ी से यात्रा कर रहा था. जब रेल के डिब्बे में वह चढ़ा, उसे यह पाण्डुलिपि वहां पहले से रखी हुई मिली. संभव है कि ‘शिवानी’ रेलगाड़ी के उसी डिब्बे से यात्रा कर रही हों और अपने स्टेशन पर उतरते समय वह पाण्डुलिपि वहीं भूलकर चली गईं हों. बहन की प्रतिक्रिया के बाद युवक ने डाक द्वारा पाण्डुलिपि को शिवानी जी के पते पर भेज दिया. बाद में वह उपन्यास रूप में पाठकों के सामने था. यह है लेखक की अलग पहचान. यही पहचान लेखक की उपलब्धि है. ऐसी मौलिकता लेखक के व्यक्तिगत जीवन से आती है.

लेखक अपनी परवरिश, परिवेश और सोचने-विचारने के तरीके से अपनी अलग पहचान बनाता है.’एआई’ अन्य क्षेत्रों में मददगार साबित हो रहा है मगर मुझे लगता है कि रचनात्मकता में मन-मस्तिष्क की जोड़ी हमेशा से ‘हिट और सफल’ जोड़ी थी और भविष्य में भी रहेगी. 

(डिस्क्लेमर: वन्दना यादव साहित्यकार, मोटिवेशनल स्पीकर और समाजसेवी हैं. उनके अब तक तीन उपन्यास समेत 25 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. वन्दना ने सेना के परिवेश और सेना में महिलाओं के जीवन पर काफी कुछ लिखा है. उन्होंने ‘सैनिक पत्नियों की डायरी’और ‘सैनिक पत्नियों की कथा और व्यथा’ समेत आधा दर्जन से अधिक पुस्तकों का संपादन किया है. वन्दना के उपन्यासों पर देश के कई विश्वविद्यालयों में शोध हो रहा है. लेखन और साहित्य में योगदान के लिए उन्हें कई सम्मानों से सम्मानित किया गया है. उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, उर्दू, उड़िया, मराठी, हरियाणवी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है. उनकी किताब ‘सब्जियों वाले गमले’ एनबीटी की बेस्ट सेलिंग किताबों की सूची में शामिल है. इस लेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)



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