ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की बातें तो हम रोज सुनते हैं, लेकिन इस वक्त यूरोप के देशों में गर्मी ने जो कहर मचाया हुआ है उसकी कहानी सिर्फ मौसम बदलने तक सीमित नहीं है. असल में, यूरोप इस वक्त अपनी ही बनाई ‘दीवारों’ में कैद सा हो गया है. वहां आसमान से बरसती आग जितनी जानलेवा है, उससे कहीं ज्यादा वहां के घर खतरनाक साबित हो रहे हैं. सदियों से ठंड से बचने के लिए जिस इंजीनियरिंग को वरदान माना जाता था, वही अब अभिशाप बन चुकी है.
यूरोप के ज्यादातर देशों में घरों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे बाहर की कड़ाके की ठंड को अंदर न आने दें और घर के भीतर की गर्मी को कैद कर सकें. इसके लिए खिड़कियों को छोटा रखा जाता है और वेंटिलेशन (हवा के निकास) की ऐसी व्यवस्था नहीं होती जैसी हमारे जैसे गर्म देशों में होती है. नतीजा यह हो रहा है कि बाहर तापमान बढ़ने पर ये घर किसी भट्टी की तरह तपने लगते हैं.
ठंड को रोकने का दांव अब पड़ा उल्टा
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और यूरोपीय संघ की सांख्यिकी एजेंसी ‘यूरोस्टेट’ के आंकड़े बताते हैं कि पूरे यूरोपीय संघ (EU) में लगभग 80 प्रतिशत घरों में एयर कंडीशनर (AC) हैं ही नहीं. यानी महज 20 प्रतिशत आबादी के पास ही कृत्रिम कूलिंग की व्यवस्था है. इसकी तुलना में अमेरिका और जापान जैसे देशों में 90 प्रतिशत से ज्यादा घरों में AC लगे हुए हैं.
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यूरोप गर्मी से बेहाल, लोग बोल रहे- ये तो नरक है, औसत से दोगुना ज्यादा हुआ तापमान
यूरोप ने हमेशा से सर्दियों को मात देने पर ध्यान केंद्रित किया. वहां के बिल्डिंग कोड्स (मकान बनाने के नियम) इंसुलेशन यानी ऊष्मारोधन को बढ़ावा देते हैं. इसके तहत दीवारों के बीच में ऐसी सामग्री भरी जाती है जो गर्मी को बाहर न जाने दे. सर्दियों में तो यह तकनीक वरदान है, लेकिन जब बाहर का पारा 40 डिग्री सेल्सियस पार कर जाता है, तो यही इंसुलेशन घर के भीतर की गर्मी को बाहर निकलने से रोक देता है. ऐसे में बिना एसी और बिना उचित वेंटिलेशन के ये घर किसी बंद तंदूर की तरह काम करने लगते हैं.
कानून बना अभिशाप
यूरोप में सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि वहां की संस्कृति और कड़े सरकारी नियम भी इस संकट को बढ़ा रहे हैं. ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में ऐतिहासिक और पुरानी इमारतों के बाहरी ढांचे में बदलाव करने या AC की बाहरी यूनिट (कंप्रेसर) लगाने पर सख्त कानूनी रोक है. स्विट्जरलैंड के कुछ इलाकों में तो घर में AC लगाने के लिए बाकायदा मेडिकल इमरजेंसी या गंभीर जरूरत का सबूत देना पड़ता है.

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इसके अलावा, यूरोपीय देशों में लंबे समय तक यह सांस्कृतिक सोच रही है कि AC की ठंडी हवा बीमार करती है और यह पर्यावरण के खिलाफ है. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) यूरोप के अनुसार, पिछले चार वर्षों में यूरोप में भीषण गर्मी के कारण 2 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है.
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