ऑपरेशन “टाइगर” से लेकर एकनाथ शिंदे की हालिया कार्यशैली, उनके हालिया भाषण और राजनीतिक रणनीतियों को देखकर यह सवाल गहराने लगा है कि क्या शिंदे जानबूझकर शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे की “टाइगर” वाली छवि को अपनाने या कॉपी करने की पूरी तरह कोशिश कर रहे हैं? शिंदे के राजनीतिक विस्तार और उनके भाषणों के तेवर इसी रणनीति का हिस्सा नजर आते हैं. “ऑपरेशन टाइगर” और बाघ के प्रतीकों का बार-बार इस्तेमाल! बीजेपी आमतौर पर दूसरे दलों में सेंधमारी के लिए “ऑपरेशन लोटस” या “ऑपरेशन कमल” का इस्तेमाल करती है, लेकिन एकनाथ शिंदे ने अपनी इस राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक और विस्तार को “ऑपरेशन टाइगर” का नाम दिया. यह महज एक नाम नहीं, बल्कि एक साफ संदेश है.
“टाइगर आपके सामने है, और टाइगर हमेशा ऑपरेशन करता है”
शिवसेना के स्थापना दिवस पर शिंदे का यह बयान कि “टाइगर आपके सामने है, और टाइगर हमेशा ऑपरेशन करता है”, उनकी नई आक्रामक रणनीति को दर्शाता है. स्थापना दिवस पर एकनाथ शिंदे ने अपने भाषण की शुरुआत में अपनी आवाज को भारी रखकर, एक बाघ की तरह गुर्राने या दहाड़ने जैसी शैली अपनाने की कोशिश की थी. महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र के पहले दिन उद्धव ठाकरे गुट के विधायक एकनाथ शिंदे के सामने जब विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, इसी दौरान शिवसेना विधायक मुर्जी पटेल ने एकनाथ शिंदे को टाइगर की छवि भेट की. खास बात यह है कि उद्धव गुट के विधायकों के विरोध प्रदर्शन के सामने एकनाथ शिंदे काफी देर तक टाइगर की यह छवि लेकर खड़े रहे. क्या जानबूझकर मीडिया और विरोधियों के सामने यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि शिवसेना का “बाघ” अब शिंदे हैं?
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बाल ठाकरे और “टाइगर” का अटूट रिश्ता!
बाल ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना के समय से ही मराठी अस्मिता और हिंदुत्व के आक्रामक तेवर को दर्शाने के लिए “दहाड़ते हुए बाघ” को पार्टी की पहचान और प्रतीक के रूप में चुना था. उनके बेखौफ अंदाज के कारण “टाइगर ऑफ मराठा” या “मराठा टाइगर” के रूप में पार्टी कार्यालयों, पोस्टरों, विज्ञापनों और मंचों पर दर्शाया जाता था. बाल ठाकरे मातोश्री या अपने सार्वजनिक कार्यक्रमों में जिस बड़ी, शाही सिंहासननुमा कुर्सी पर बैठते थे, उसे अक्सर बाघ की थीम पर डिजाइन किया जाता था, मातोश्री में उनके सोफा के दोनों ओर शेर या बाघ के मुख की कलाकृति बनी होती थी, जो उनके रुतबे और दबदबे की प्रतीक थी.
हिंदुत्व के आक्रामक रुख को भी कॉपी कर रहे हैं शिंदे
बाल ठाकरे की बेखौफ और बिंदास शख्सियत की वजह से प्रशंसक उन्हें टाइगर कहते थे. सामना के कार्टून्स और संपादकीय में बालासाहेब हमेशा अपनी पार्टी को एक खूंखार बाघ के रूप में चित्रित करवाते थे, जो अपने राजनीतिक दुश्मनों का शिकार करता है. उनका रुतबा, बिना किसी संवैधानिक पद के सत्ता को नियंत्रित करने की क्षमता और उनकी बेबाक बयानबाजी ने उन्हें महाराष्ट्र का “टाइगर” बना दिया था. शिंदे इसी आभामंडल को शायद भुनाना चाहते हैं. सिर्फ बाघ के प्रतीक को ही नहीं, बल्कि बाल ठाकरे की “दरबार” लगाने की शैली आम शिवसैनिकों के लिए 24 घंटे दरवाजे खुले रखना और हिंदुत्व के आक्रामक रुख को भी कॉपी कर रहे हैं.
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”बिग ब्रदर” की भूमिका में आने की कवायद
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और उद्धव गुट UBT के सांसदों को तोड़ने के बाद, स्थिति यह बन गई है कि लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या महाराष्ट्र में बीजेपी से ज्यादा हो गई है. इस संख्या बल के बाद अब एकनाथ शिंदे राज्य में उद्धव गुट के विधायकों पर भी नजर फेर रहे हैं! और एक तरह से उसी “बिग ब्रदर” की भूमिका में आने की कवायद कर रहे हैं, जिस भूमिका में कभी बाल ठाकरे महाराष्ट्र में गठबंधन के भीतर हुआ करते थे. बाल ठाकरे हमेशा यह तय करते थे कि महाराष्ट्र में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में रहेगी और बीजेपी छोटे भाई की. सवाल उठ रहे हैं की क्या शिंदे अब उसी फॉर्मूले को दोबारा स्थापित कर रहे हैं?
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किसकी शह पर हो रहा है यह सब? और निशाने पर कौन?
विरोधियों को लगता है की शिंदे का यह बढ़ता कद और आत्मविश्वास बिना किसी बड़े “आशीर्वाद” के संभव नहीं है। यहीं से महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे दिलचस्प और उलझा हुआ पन्ना खुलता है, जिसमें पहला अध्याय जोड़ा राज ठाकरे ने! MNS प्रमुख राज ठाकरे ने हाल ही में बड़ा दावा किया है कि एकनाथ शिंदे को यह सब करने की शह सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिल रही है. राज ठाकरे के मुताबिक, बीजेपी के भीतर अंतर्कलह चल रही है और अमित शाह 2029 के लिए एक अलग और मजबूत गुट तैयार कर रहे हैं, ताकि भविष्य में राजनीतिक समीकरणों को अपने हिसाब से साधा जा सके. उद्धव की शिवसेना के मुखपत्र “सामना” में भी सवाल उठे की क्या राज्य में फडणवीस को कमजोर करने की साजिश हो रही है? संपादकीय में भी इसी थ्योरी को हवा दी गई.
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