शर्मनाक! ओडिशा में जब बेटे को साइकिल पर ले जाना पड़ा पिता का शव, वजह जान आप भी रह जाएंगे हैरान | bargarh odisha man carries father dead body on bicycle

bargarh odisha man carries father dead body on bicycle शर्मनाक! ओडिशा में जब बेटे को साइकिल पर ले जाना पड़ा पिता का शव, वजह जान आप भी रह जाएंगे हैरान | bargarh odisha man carries father dead body on bicycle


भारत में आज भी जातिवाद का जहर किस कदर इंसानी संवेदनाओं को लील रहा है, इसकी एक बेहद दर्दनाक और शर्मसार कर देने वाली तस्वीर ओडिशा के बारगढ़ जिले से सामने आई है. यहां सामाजिक बहिष्कार और अंधविश्वास की एक ऐसी क्रूर दास्तां लिखी गई, जिसने मानवता को तार-तार कर दिया. पाईकमल ब्लॉक के कांतापाड़ा गांव में एक लाचार बेटे को अपने मृत पिता के शव को साइकिल पर लादकर श्मशान घाट ले जाना पड़ा, क्योंकि गांव के तथाकथित समाज ने शव को कंधा देने से साफ इनकार कर दिया था.  

बेटों ने अपनी मर्जी से की थी शादी

जानकारी के अनुसार, गांव के एक बुजुर्ग का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. परिवार पर दुखों का पहाड़ पहले ही टूट चुका था, लेकिन समाज की क्रूरता ने इस दुख को असहनीय बना दिया. मृतक बुजुर्ग के बेटों ने अपनी जाति से बाहर (अंतरजातीय) शादी की थी. बस इसी बात से नाराज ग्रामीणों ने परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर रखा था. 

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Photo Credit: NDTV

जब बुजुर्ग की सांसें थमीं, तो बेटों को उम्मीद थी कि मौत के इस गमगीन मौके पर शायद गांव के लोग पुरानी बातें भुलाकर मदद के लिए आगे आएंगे. लेकिन समाज की संकीर्ण सोच के आगे मिन्नतें भी हार गईं. अंतिम संस्कार की तैयारियों के बीच गांव का कोई भी शख्स कंधा देने तो दूर, सांत्वना देने भी नहीं पहुंचा.

एक स्‍थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा क‍ि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज के दौर में भी समाज इतना संवेदनहीन हो सकता है. जहां एक तरफ हम डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी रूढ़िवादिता पैर पसारे हुए है. 

न वाहन मिला, न अपनों का साथ; साइकिल ही बनी आखिरी सहारा

अपनों के दुत्कारे जाने के बाद दुखी परिवार ने सरकारी या निजी शव वाहन का इंतजाम करने की कोशिश की. लेकिन सुदूर ग्रामीण इलाका होने और आर्थिक तंगी के कारण उन्हें समय पर कोई वाहन भी नसीब नहीं हुआ. घंटों इंतजार करने और हर तरफ से निराशा हाथ लगने के बाद, एक बेटे का सब्र टूट गया. उसने भारी मन और डबडबाई आंखों से अपने पिता के बेजान शरीर को एक साइकिल के पीछे रस्सी से बांधा और खुद पैदल चलते हुए उसे श्मशान घाट की तरफ ले जाने लगा. रास्ते में जिसने भी यह मंजर देखा, उसकी रूह कांप गई, लेकिन व्यवस्था और समाज के ठेकेदारों की आंखें फिर भी नहीं खुलीं. 

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सोशल मीडिया पर फूटा गुस्सा, प्रशासन पर उठे सवाल

साइकिल पर शव ले जाने का यह वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों का गुस्सा भड़क उठा है. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय निवासियों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है. लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ग्रामीण इलाकों में बुनियादी स्वास्थ्य और शव वाहन सेवाएं इतनी लाचार क्यों हैं? साथ ही, सामाजिक बहिष्कार करने वाले ग्रामीणों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की मांग की जा रही है ताकि भविष्य में किसी और लाचार को अपने आत्मसम्मान और अपनों के शव के साथ इस तरह मजबूर न होना पड़े. 

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