भारत सहित पूरी दुनिया में ईद-उल-अजहा यानी बकरीद का त्योहार बेहद अक़ीदत, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस्लाम में इसे मूल रूप से ‘बलिदान का त्योहार’ कहा जाता है. हालांकि, बदलते दौर के साथ आधुनिक समाज में इस त्योहार, विशेषकर पशु-कुर्बानी को लेकर कई तरह के वैचारिक विवाद, सोशल मीडिया डिबेट्स और कानूनी सवाल भी सामने आने लगे हैं. कुछ लोग इसे पर्यावरण और जीव-दया के चश्मे से देखते हैं, तो कुछ इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सदियों पुरानी परंपरा मानते हैं. ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि बकरीद का असल संदेश क्या है, कुर्बानी क्यों और कैसे दी जाती है, और आज के संदर्भ में इन विवादों की हकीकत क्या है?
बकरीद क्यों मनाया जाता है?
इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी) के आखिरी महीने ‘ज़ुल-हिज्जा’ की दसवीं तारीख को ईद-उल-अज़हा मनाई जाती है. यह त्योहार केवल गोश्त खाने या जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, आत्मत्याग और अटूट विश्वास का प्रतीक है. यह त्योहार पैगंबर हज़रत इब्राहिम (अलैहिस सलाम) के उस महान बलिदान की याद में मनाया जाता है, जब वे अल्लाह के हुक्म पर अपने इकलौते और प्रिय बेटे हज़रत इस्माइल को कुर्बान करने के लिए तैयार हो गए थे. इस त्योहार का मूल मकसद इंसान के भीतर से ‘मैं’ यानी अहंकार और लालच को खत्म करना है. यह सिखाता है कि समाज और इंसानियत की भलाई के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ को भी त्यागने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए.
कुर्बानी का असल मतलब समझिए
आमतौर पर लोग समझते हैं कि किसी जानवर को ज़बह कर देना ही कुर्बानी है, लेकिन इस्लामिक दर्शन में ‘कुर्बानी’ शब्द का अर्थ बहुत व्यापक है. कुर्बानी अरबी के शब्द ‘क़ुर्ब’ से बना है, जिसका सीधा मतलब ‘नज़दीकी हासिल करना’ होता है. यानी यह वह अमल है जिससे इंसान ईश्वर के करीब आ सके.
पवित्र कुरान के सूरह अल-हज में साफ तौर पर कहा गया है कि अल्लाह तक न तो जानवरों का गोश्त पहुँचता है और न ही उनका ख़ून, बल्कि उस तक तो इंसान का तक़वा यानी मन की पाकीज़गी और परहेजगारी पहुँचती है.
कुर्बानी के लिए इस्लाम में बहुत सख्त और संवेदनशील नियम बनाए गए हैं, जिनका एकमात्र मकसद जानवर को कम से कम तकलीफ पहुँचाना और सामाजिक व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना है. नियमों के अनुसार कुर्बानी के लिए जानवर का पूरी तरह वयस्क और स्वस्थ होना अनिवार्य है. इसके तहत बकरा या बकरी कम से कम एक साल, गाय या भैंस दो साल और ऊँट का पांच साल का होना ज़रूरी है.
कोई भी ऐसा जानवर जो अंधा, लंगड़ा, बीमार या अत्यधिक कमज़ोर हो, उसकी कुर्बानी मान्य नहीं मानी जाती. साथ ही यह भी निर्देश है कि जानवर को भूखा-प्यासा न रखा जाए, उसके सामने छुरी तेज़ न की जाए और एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को ज़बह न किया जाए ताकि उसे कोई मानसिक कष्ट न हो. इस त्योहार में गोश्त का न्यायपूर्ण बंटवारा सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है.

कुर्बानी के गोश्त को अनिवार्य रूप से तीन हिस्सों में बांटा जाता है.
- पहला हिस्सा गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए होता है ताकि समाज में कोई भी भूखा न रहे.
- दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों, पड़ोसियों और दोस्तों के लिए सामाजिक भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए रखा जाता है.
- तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए होता है.
परंपरागत रूप से लोग अपने घरों या मुहल्लों में कुर्बानी करते थे, लेकिन आधुनिक समय और नागरिक व्यवस्था को देखते हुए इसमें बड़े बदलाव आए हैं. कानूनी और स्वच्छता के लिहाज़ से अब सरकार और इस्लामी विद्वान भी सामूहिक रूप से यही सलाह देते हैं कि कुर्बानी केवल नगर निगम द्वारा निर्धारित स्थलों या बूचड़खानों में ही दी जाए.
शहरों में अब लोग मिलकर किसी एक बड़े मैदान या मदरसे में सामूहिक रूप से इसका इंतज़ाम करते हैं, जहां साफ-सफाई और अपशिष्ट के निस्तारण की उचित व्यवस्था होती है. खुले रास्तों, सड़कों या किसी ऐसी जगह पर जहाँ दूसरे धर्म या विचार के लोगों को आपत्ति हो, वहाँ कुर्बानी करना कानूनी और धार्मिक दोनों रूप से सर्वथा गलत माना गया है.

पिछले कुछ वर्षों में बकरीद आते ही कई तरह के विवाद सोशल मीडिया और टीवी डिबेट्स का हिस्सा बन जाते हैं, जिनके व्यावहारिक और तार्किक पहलुओं को समझना बेहद ज़रूरी है. आलोचकों का कहना है कि एक ही दिन में लाखों बेज़ुबान जानवरों को मारना क्रूरता है. इसके जवाब में मुस्लिम विद्वानों और आहार विशेषज्ञों का तर्क है कि इस्लाम में केवल उन्हीं जानवरों की कुर्बानी की अनुमति है जो शाकाहारी मवेशी हैं और जिन्हें दुनिया भर में रोज़ाना भोजन यानी मीट इंडस्ट्री के रूप में खाया जाता है.
एक अन्य आक्षेप यह भी है कि खुले में ज़बह करने से गंदगी फैलती है, जिससे बीमारियां होने का खतरा रहता है और सड़कों पर खून बहता है. इस संबंध में उलेमा अब लगातार यह अपील करते हैं कि खून और गंदगी को सड़कों पर न बहने दें, उसे मिट्टी में दफनाएं या ब्लीचिंग पाउडर डालकर साफ करें. प्लास्टिक की थैलियों में अपशिष्ट भरकर खुले में न फेंकें और गंदगी या रक्तपात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट न करें, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों.

क्या जानवरों की कुर्बानी के बदले उतना पैसा गरीबों में दान नहीं कर देना चाहिए
कुछ प्रगतिशील विचारकों का यह भी कहना है कि जानवर काटने के बजाय उसकी कीमत का पैसा गरीबों की शिक्षा या स्वास्थ्य पर खर्च कर देना चाहिए. पारंपरिक इस्लामी न्यायशास्त्र के अनुसार, जिस तरह नमाज़ की जगह केवल नमाज़ पढ़ी जा सकती है और रोज़े की जगह केवल रोज़ा रखा जा सकता है, उसी तरह ईद-उल-अज़हा के तीन दिनों में ‘कुर्बानी’ एक विशिष्ट इबादत और प्रतीकात्मक रस्म है, जिसे सीधे पैसे से रिप्लेस नहीं किया जा सकता. हालांकि, इस्लाम में साल के बाकी सभी दिन जकात, सदका और खैरात के ज़रिए गरीबों की आर्थिक मदद करने का बेहद सख्त नियम पहले से मौजूद है.
बकरीद पर गाय की कुर्बानी के भारत में कायदे
इस पूरे विमर्श में एक सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा गाय की कुर्बानी का है. हालाँकि सैद्धांतिक रूप से बड़े जानवरों में गाय भी शामिल है, लेकिन चूंकि हिंदू नागरिक गाय से गहरी धार्मिक आस्था रखते हैं, इसलिए भारतीय मुसलमान आपसी एकता और सौहार्द बनाए रखने के लिए आमतौर पर गाय की कुर्बानी से पूरी तरह परहेज करते हैं. यदि हम इतिहास पर नज़र डालें, तो हिंदू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने के लिए बड़े-बड़े शासकों और विचारकों ने इसके कड़े संदेश दिए हैं.
इसी तरह, उन्नीसवीं सदी की प्रसिद्ध सामाजिक और सुधारवादी शख्सियत सर सैयद अहमद खान ने भी भारत में आपसी एकता के लिए मुसलमानों को गाय की कुर्बानी से बचने की राय दी थी और उन्होंने अपने द्वारा स्थापित मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (अब एएमयू) में गाय की कुर्बानी पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था.
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान खिलाफत आंदोलन के प्रमुख नेता हकीम अजमल खान ने भी राष्ट्रीय एकता के लिए मुसलमानों को सार्वजनिक रूप से गाय की कुर्बानी न करने की सलाह दी थी.

बकरीद का असल संदेश समझिए
वास्तव में बकरीद का त्योहार हमें त्याग और सह-अस्तित्व सिखाता है. आज के बहु-सांस्कृतिक और संवेदनशील समाज में इस त्योहार को मनाते समय दोतरफा संवेदनशीलता की महती आवश्यकता है. एक तरफ मुस्लिम समाज की यह ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए स्थानीय कानूनों का पूरा पालन करे, साफ-सफाई का उच्चतम स्तर बनाए रखे और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं तथा शाकाहारी लोगों की संवेदनशीलता का सम्मान करते हुए खुले में या प्रदर्शन करके कुर्बानी न दे.
वहीं दूसरी तरफ, बाकी समाज की भी यह ज़िम्मेदारी है कि वह इस त्योहार को केवल गोश्त खाने या क्रूरता के चश्मे से देखने के बजाय इसके पीछे छिपी गरीब-कल्याण और हज़रत इब्राहिम के ऐतिहासिक आत्मत्याग की उदात्त भावना को समझे. आखिरकार, कोई भी त्योहार तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक वह समाज में शांति, सद्भाव और आपसी भाईचारा न पैदा करे, और बकरीद का भी यही असल पैग़ाम है.
(डिस्क्लेमर: लेखक डॉ. असद फैसल फारूकी, अलीगढ़ की मंगलायतन यूनिवर्सिटी के जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)


