सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन मांगने का अधिकार नहीं, भले ही वैकेंसी पुरानी हो… सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन मांगने का अधिकार नहीं, भले ही वैकेंसी पुरानी हो... सुप्रीम कोर्ट की दो टूक सरकारी कर्मचारियों को प्रमोशन मांगने का अधिकार नहीं, भले ही वैकेंसी पुरानी हो... सुप्रीम कोर्ट की दो टूक

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सरकारी कर्मचारियों को केवल इस आधार पर प्रमोशन का अधिकार नहीं मिल जाता कि पद पुराने सेवा नियमों के समय खाली हुए थे. अदालत ने साफ किया कि सरकार के पास प्रशासनिक और नीतिगत सुधारों के तहत चयन प्रक्रिया में बदलाव करने की पूरी शक्ति है. बशर्ते यह फैसला मनमाना न हो.

‘निहित अधिकार जैसी कोई चीज नहीं’

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी भी कर्मचारी को प्रमोशन का कोई निहित अधिकार या  वैध अपेक्षा प्राप्त नहीं होती है. चयन और भर्ती की प्रक्रिया तय करना पूरी तरह से सरकार के नीतिगत फैसले का हिस्सा है. अदालत ने कहा कि सरकार को सेवा नियमों में बदलाव करने का अधिकार तब तक है, जब तक कि वह निर्णय मनमाना या दुर्भावनापूर्ण न हो.

क्या था पूरा मामला?

यह मामला ओडिशा के परिवहन विभाग के कर्मचारियों से जुड़ा हुआ था. कर्मचारी असिस्टेंट रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिसर यानी ARTO के पद पर प्रमोशन की मांग कर रहे थे. उनका कहना था कि चूंकि वैकेंसी पुराने नियमों के समय की हैं, इसलिए वे पुराने नियमों के तहत ही प्रमोशन के पात्र हैं. वहीं राज्य सरकार ने 2017 में कैडर पुनर्गठन किया था और इसके बाद 2021 में नए सेवा नियम लागू कर दिए. नए नियमों के तहत ARTO के पद को चयन पद बना दिया गया. अब इस पद पर भर्ती ओडिशा लोक सेवा आयोग (OPSC) द्वारा आयोजित एक एग्जाम के माध्यम से तय की जानी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश पलटा

इससे पहले, ओडिशा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पुराने नियमों के तहत ही कर्मचारियों के प्रमोशन पर विचार करने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि अगर सरकार पदों के पुनर्गठन के बाद प्रशासनिक दक्षता के लिए नई और अधिक प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अपनाती है, तो उसे किसी भी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता.

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