सोवियत संघ से निकले आर्मेनिया ने इस सप्ताह यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की यूरोपीय शिखर सम्मेलन की मेजबानी की तो रूस ने आज इस पर टिप्पणी करते हुए इसे “समझ से परे” बताया. साथ ही आर्मेनिया को यूरोपीय संघ से नजदीकी के खिलाफ चेतावनी दी. रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने साप्ताहिक ब्रीफिंग में कहा, “रूसी समाज ने गहरी नाराजगी और हैरानी के साथ न केवल यह देखा, बल्कि सबसे बढ़कर इस तथ्य को याद किया कि आर्मेनिया, जिसे हम एक मित्रवत, भाईचारे वाला देश मानते हैं, एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया गया. किसके लिए? एक आतंकवादी के लिए.”
रूस के सवाल, आर्मेनिया से जवाब
मारिया जखारोवा ने पूछा, “आर्मेनिया के मौजूदा नेतृत्व में किसी ने भी जेलेंस्की का अपमान नहीं किया. तो ऐतिहासिक रूप से आप किसके पक्ष में हैं?” जवाब में आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान ने गुरुवार को पत्रकारों से कहा: “2022-2023 में ही मैंने स्पष्ट कर दिया था कि यूक्रेन के मुद्दे पर हम रूस के सहयोगी नहीं हैं.” जखारोवा ने मंगलवार को हुए शिखर सम्मेलन में आर्मेनिया और यूरोपीय संघ द्वारा अपनाई गई संयुक्त घोषणा की भी आलोचना की. यह दस्तावेज आर्मेनिया की यूरोपीय संघ में शामिल होने की आकांक्षा को मान्यता देता है, साथ ही आर्थिक और सुरक्षा मामलों में दोनों पक्षों के बीच सहयोग को भी मजबूत करता है.

पुतिन ने भी दे रखी है चेतावनी
जखारोवा ने कहा, “आर्मेनियाई अधिकारियों का ऐसा कदम येरेवन को ब्रसेल्स की रूस-विरोधी नीति में अपरिवर्तनीय रूप से शामिल कर देगा, जिसके परिणामस्वरूप आर्मेनिया को राजनीतिक और आर्थिक रूप से गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे.” ईरान और तुर्की की सीमा से लगे तीन मिलियन आबादी वाले इस देश ने पिछले साल एक कानून पारित कर यूरोपीय संघ की सदस्यता के लिए आवेदन करने की औपचारिक घोषणा की थी. रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अप्रैल में पशिन्यान को चेतावनी दी थी कि येरेवन यूरोपीय संघ और रूस के नेतृत्व वाले सीमा शुल्क ब्लॉक, दोनों का सदस्य नहीं हो सकता.

रूस से क्यों आर्मेनिया नाराज
आर्मेनिया ने 1991 से अपनी सुरक्षा के लिए रूस पर भरोसा किया. रूस का आर्मेनिया में मिलिट्री बेस भी है और CSTO सुरक्षा समझौता भी, लेकिन 2020 और 2023 में अजरबैजान ने नागोर्नो-काराबाख पर हमला किया तो रूस ने मदद नहीं की. रूसी शांति सैनिक वहां तैनात थे, फिर भी अजरबैजान ने पूरा क्षेत्र कब्जा लिया. 1 लाख से ज्यादा अर्मेनियाई लोगों को पलायन करना पड़ा. PM निकोल पाशिनयान ने तब बयान दिया था, “सिर्फ रूस पर निर्भर रहना रणनीतिक भूल थी”. उन्होंने कहा रूस आर्मेनिया की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहा.
रूस ने क्यों नहीं की मदद
असल में आर्मेनिया की तरह ही अजरबैजान भी सोवियत संघ का हिस्सा था. 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की सेना और संसाधन वहीं उलझ गए. मॉस्को अब दो मोर्चे नहीं संभाल सकता था. इसलिए रूस ने काराबाख में हस्तक्षेप नहीं किया और सिर्फ “शांति की अपील” करता रहा. अजरबैजान से भी रूस के रिश्ते अच्छे हैं. रूस अजरबैजान को नाराज नहीं करना चाहता था. अजरबैजान बड़ा ऊर्जा सप्लायर है. अजरबैजान के पीछे तुर्की है. रूस तुर्की से रिश्ते खराब नहीं करना चाहता था. अजरबैजान के 60% हथियार इजरायली हैं.

भारत कौन सा दोस्त चुनेगा
रूस की ढाल गिरने के बाद आर्मेनिया भारत को सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार मान रहा है. भारत पिनाका रॉकेट लॉन्चर और घातक हथियार दे रहा है. ये तुर्की-पाकिस्तान-अजरबैजान गुट का जवाब है. अजरबैजान भी लगातार कश्मीर पर भारत के खिलाफ बोलता है. रूसी सैनिक 5 अर्मेनियाई सीमा क्षेत्रों से हट रहे हैं, लेकिन ग्युमरी में रूसी सैन्य अड्डा और ईरान-तुर्की बॉर्डर पर रूसी गार्ड बने रहेंगे. कुल-मिलाकर कहें तो आर्मेनिया को लगा कि रूस ने नागोर्नो-काराबाख में धोखा दिया. अब वो सुरक्षा के लिए अमेरिका, EU, भारत और चीन की तरफ देख रहा है. रूस अपना प्रभाव बचाने के लिए धमकी और रियायत दोनों दे रहा है. अब भारत की दिक्कत ये है कि एक तरफ रूस होगा तो दूसरी तरफ आर्मेनिया. ये सबसे बुरी स्थिति होगी. क्योंकि यूक्रेन से भारत के उतने अच्छे संबंध नहीं थे, जितने रूस से. मगर आर्मेनिया यूक्रेन नहीं है. इससे भी बड़ी बात है कि रूस का अजरबैजान के पक्ष में जाना भी भारत के लिए सही संकेत नहीं होगा. यहीं से भारत-रूस-आर्मेनिया की कूटनीति की परीक्षा शुरू होती है.
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